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वर्ष: 1, अंक15, जून(द्वितीय), 2017





नमस्कार
संपादक महोदय!!

    प्रतिक्रिया---साहित्यसुधा (जून 2017)

  आज पहली बार साहित्यसुधा का जून 2017 अंक आ डॉ.अनिल चड्डा जी (संपादक) द्वारा ईमेल पर प्राप्त हुआ।अंक को पढ़कर अति प्रसन्नता हुई।डॉ.अनिल चड्डा जी के संपादकीय में लिखा "ग्रहण " गीत समसामयिक जीवन की विसंगतियों का दिग्दर्शन करवाता भावपूर्ण गीत निराश में आशा का संचार करता है।रश्मि सुमन जी की कविता" कैसे दे दूँ मकान की संज्ञा ...आन दीवारों को" काबिलेतारीफ है जिसमें अहम् को त्यागने एवं विश्वास को अंगीकार करने.पर बल दिया गया।संजय वर्मा दृष्टि की कविता "वेदना"

  गौरेया के दर्द को ब्याँ कर मानव मन में पशु पक्षियों के प्रति प्रेमभाव पैदा करती है।योगेश ध्यानी जी की कविता "बीमारी" में ---जल्दी बन्द करो ताबूत---हृदयविदारक चित्रण है।अशोक अंजुम जी की गज़ल चिडिय़ा के आसमान छूने की ललक बहुत खूब लगी।डॉ.कामिनी कामायनी जी अपनी लघुकथा "छोटी मछली "के माध्यम से बड़ी मछली का दिग्दर्शन अप्रत्यक्ष रूप से करवाने में सफल हुई हैं।सुशील कुमार शर्मा की "भाग्यशाली "बालमनोविज्ञान का सटीक उदाहरण है।तारकेश कुमार ओझा जी रचित "दूर के रसगुल्ले ,पास के गुलगुले" बहुत प्रभावशाली लगा ।डॉ.सुरेंद्र वर्मा के हाइकु संग्रह "दहकते पलाश" पर सुशील जी की समीक्षा ने चार चाँद लगा दिये।अजित पाण्डेय शफ़क का "गीत" सुंदर है।डॉ.योगेंद्र नाथ शर्मा अरुण जी का गीत "प्यार तुम्हारा" प्रेम की सरल,सहज,शाश्वत अभिव्यक्ति है।सुदर्शन सोनी जी रचित "टीयर गर्ल्स" खूबसूरत भावनाओं की अभिव्यक्ति है।पितृ दिवस पर कविता गुप्ता जी का संस्मरण नमन योग्य है।भविष्य में भी "साहित्यसुधा" की यह पावन धारा का स्रोत हमें पढ़ने को प्राप्त होता रहे!!

शुभाकांक्षी--
डॉ.पूर्णिमा राय
शिक्षिका एवं लेखिका
वेबसाइट--www.achintsahitya.com

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