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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 62, जून(प्रथम), 2019

पुण्य बटोर लें डाॅट काम

सुदर्शन कुमार सोनी

आज सात आठ साल का बच्चा तक इंटरनेट के सौजन्य से एक झटके में लाखों करोडो़ं कमा डालता है। घर में दिन भर यहां से वहां दौड़ने वाला नटखट अचानक एक एैप बना डालता है जो दौड़ जाता है , लाखों करोडो़ं की कमाई हो जाती है। इधर अपन और अपने जैसे न जाने कितने लोग सालों से घिस रहे हंै , लेकिन अभाव व कमी हमसे ऐसी चिपकी है फेवीकोल के जोड़ की तरह अलग ही नही होती। एक नेक बंदे ने हमको नेक सलाह दी कि डिजिटल युग के साथ कदम ताल करो। दौलत व शौहरत दोनों इन्सटेंट मिलेगी ! थोडा़ हाईटेक हो जाओ अपने इरादों को अटल कर कुछ डिजिटल कर डालो।

यों तो अपन को भी भगवन ने खोपडी़ ऐसी दी है जो दिन भर कुछ न कुछ नया करने को उसी तरह सोचती रहती हैं जैसे कि हमारे नेतागण की नये नये बयान देने सोचते रहती है ! एक दिन इसी खोपडी़ को कुछ दूसरी खोपड़ियों की पुण्य अर्जित करने की एक करतूत से उस बगीचे मंे जहां अपन भी घूमने रोजीना जाते है एक धांसू आयडिया पसरा मिला। आप जानते ही हैं कि एक आयडिया जिंदगी बदल देता है ! वैसे अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में ये पाप कर्माें से गले तक डूबी आत्मायंे बगीचे में स्थित एक तालाब में मझलियों को दाना डालने के बहाने पुण्य कमाने में लगी थीं।तालाब के पाल मंे पुण्यात्माओं की भीड़ के कारण तिल रखने तक की जगह नही थी। मझलिया भी इस जोर जबरदस्ती से परेशान तो थीं उन्हे अजीर्ण तक हो रहा था , लेकिन मुफ्तखोरी में इंसान तो क्या जीव जन्तु तक ठूंस ठूंस कर खाता है।

बगीचे मंे अनुलोम विलोम पा्रणायम करते हमारी खोपडी़ में विचारों का अनुलोम हुआ कि आदमी के पाप कर्मो का गा्रफ जितनी तेजी से बढ़ रहा हैै उससे दूनी गति से पुण्य कमाने के चस्के का गा्रफ भी बढ़ रहा है ! तो हम क्यों न पुण्य के फील्ड मंे गहरे पैठ जायें। पुण्य का सीधा संबंध आस्था से है जिसका बाजार ’बाजारों का बाजार’ है। सारे बाजार इसके सामने पानी भरते हैं ! इसी के दम व खम पर न जाने कितने साधु बाबा और महात्मा आज एैश कर रहे हैं। जिनका कोई खाता नही होना चाहिये था वे एैश व कैश के पहाड़ पर बैठे हैं ! हां इनमें से कुछ जरूर हाल ही में पहाड़ से तिहाड़ में बिठा दिये गये हैं !

हमारी खोपडी़ ने कहा-जब राखी बांधना , दीवाली के फटाके फोड़ना तक आनलाईन हो रहा है , तो पुण्य क्यों नही आनलाईन बटोरा जा सकता ? हमने झट एक बेवसाईट ’पुण्य बटोर लें डाटकाम’ बनवा डाली और इसमें सब तरह के पुण्य कर्मो को करने का वर्चुअल अरेन्जमेंट रख दिया। अब सैकडो़ं क्लिक से पाप की अंधी कमाई कर चुका आदमी एक क्लिक से पुण्य कमा सकता था। हमनंे इसमें पुण्य कमाने के नाना तरह के आयटमों की दुकान होम पेज पर सजा रखी थी! लाखों लोग इसको सर्फ्र कर रहे थे। विज्ञापन क्षेत्र के दिग्गजों का कहना था कि इतना तो सर्फ के विज्ञापन को भी कभी सर्फ नही किया गया था।

अब लोग एक मामूली सी फीस पर कन्या भोज आनलाईन करवा सकते थे ! फीस के मान से उतनी संख्या में कन्यायें आपकी अंखियों के सामने ही वर्चुअल तरीके से कन्या भोज कर सकती थीं , मेन्यू भी आनलाईन तय करने की सुविधा।

वर्चुअल तालाब में वर्चुअल मछली और उनको वर्चुअल दाना देना , वर्चुअल चीटीं को आटा देने , वर्चुअल परिंदों के लिये सकोरे की व्यवस्था । पुण्य ही पुण्य बटोरने व कमाने का मौका ! आगे पुण्य , पीछे पुण्य , दांये पुण्य , बायें पुण्य ,ऊपर पुण्य नीचे पुण्य ! लोगों में होड़ मच गयी ’पुण्य बटोर लें डाॅट काम’ के माध्यम से पुण्य बटोरने की !

चारों धाम तीर्थ यात्रा की व्यवस्था और वहां पवित्र स्नान की व्यवस्था सब वर्चुअल कर रखी थी। केवल अंटी ढीली करनी होती थी । बाकी सब हमारी साईट करवाती थी। केदारनाथ बद्रीनाथ तक के आनलाईन दर्शन की व्यवस्था थी। कैलाश मानसरोवर यात्रा शीघ्र ही वर्चुअल तरीके से आप कर सकेंगे की न्यूज बेवसाईट पर फ्लेश हो रही थी। इसको प्रति सेकेंड हजार से ऊपर क्लिक मिल रहे थे । हमें तो बेवसाईट कै्रश होने की आशंका में बीच बीच मंे मेन्टेनेन्स के नाम पर इसको बंद करना पडा़ !

अप्रैल मई की लू में लोग कैसे दो घूंट पानी के अभाव में पा्रण त्याग देते है। हमारी साईट में इसका वर्चुअल दृश्य था। आप पुण्य कमाने प्याऊ खोल सकते हंै , प्याऊ के कई प्लान , पोस्ट पेड , प्रि पेड , ज्यादा पैसा निवेश कर सकते हों तो मिनरल वाटर का प्याऊ जिसमें कि वर्चअुल सुंदर बाला वर्चुअल मुस्कान के साथ वर्चुअल पानी पिलायेगी। वर्चुअल पक्षियों को वर्चुअल दाना पानी की व्यवस्था भी हमारी साईट करवा रही थी। कंपनियों के विज्ञापन बटोर अतिरिक्त कमाई कर हम भी दोनों हाथों से पुण्य बटोर रहे थे !

भिखारियों को भोज , पंडितों को दान जैसे पुण्य कर्मो की भी वर्चुअल व्यवस्था थी । हर तरह के पाप के बाद पश्चाताप के तौर पर मैचिंग पुण्य की व्यवस्था ’पुण्य बटोर लें डाट काम’ करवा रही थी। हमारी माली हालत साल भर में ही बदल गयी थी । किसी के आयें या न आयें हमारे अच्छे दिन आ हमारा सीना अब छप्पन इंच का हो गया था ! अन्य सैकडांे़ लोगांे की तरह हमनें आस्था का व्यापार भले ही आनलाईन वर्जन हो शुरू कर अपना झंडा गाड़ दिया था।

सच्ची है एक आयडिया आपकी दुनिया बदल सकता है ।


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