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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 62, जून(प्रथम), 2019

शब्द

विनोद महर्षि(अप्रिय)

शब्द खुशी है, शब्द गम है शब्द जहां है शब्द ही हम है शब्दो का ही सब खेल है प्रेम शब्दो का ही मेल है शब्द दो दिलों को जोड़ता है शब्द ही रिस्तो को तोड़ता है शब्द ही अपने यहां बनाते है शब्द ही दूरियां यहां बढ़ाते है वाणी का प्रखर तीर है शब्द संग्राम का सूरवीर है शब्द सुकर्म की पहचान है शब्द आन मान और शान है शब्द मनस विचारों की अनुभूति है सात्विकता की यह प्रतिमूर्ति है इकरार का अमृत है शब्द तकरार का बीज है शब्द धरा और अम्बर है शब्द दौलत का भंडार है शब्द सोच है साकार है शब्द मन का विकार है शब्द कुत्सित कुकर्म है शब्द सत्संग है सुकर्म है शब्द मनु का आकर्षण है शब्द दैत्य का प्रतिकर्षण है शब्द अप्रिय निवेदन करता है शब्द कभी नही मरता है बोलने से पहले तोलना है बिन सोचे नही बोलना है घाव शमसीर के भी भर जाते है शब्द के घाव नासूर बन जाते है ना तोड़ना कोई रिश्ता शब्द से प्रेम बढ़ाना है हमे इसी शब्द से


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