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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 62, जून(प्रथम), 2019

लसोङे

रामदयाल रोहज

सूरज बहुत बरसा रहा है आग के कोङे कङे डरपोक डरकर छुप रहे लेकिन लसोङे है खङे | होकर गर्म जब रीस में आता पवन जब पास है व्यवहार शीतल देखकर करता क्रुद्ध का नाश है | फिर फिरकर फैलाता उसकी सुगंध-सराहना इधर उधर कहता कण-कण के कानों में 'हैं इनसे अच्छा कौन अपर'| मतवाली मधु मक्खियाँ मग्न सुरभि से मल मल नहा रही भर कर घङे मकरंद के कुछ गुनगुनाती जा रही | नादान बच्चों को बुलाता मधुर फल अब लो पके अरे गोंद की डलियाँ भी है भरपूर खा लो बिन टके | जेठ की जलती दुपहरी सब तरु है अनमने लेकिन लसोङे महकते खिलते खङे निर्भय घने |


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