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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 62, जून(प्रथम), 2019

कितने ग़म बाक़ी रहे

यूसुफ़ रईस

ख़र्च कितने हो चुके हैं कितने हम बाक़ी रहे मेरे हिस्से के बताओ कितने ग़म बाक़ी रहे। रखना तू महफ़ूज़ मेरे क़ल्ब में ईमान को जब तलक मेरे ख़ुदा इस दम में दम बाक़ी रहे। ख़्वाहिशों के आगे रख दी सबने ही खुद्दारियाँ शहर में अब लोग कितने मोहतरम बाक़ी रहे। जो ज़माने का ख़ुदा कहते थे अपने आप को ऐसा कहने वाले कितने ख़ुश-फ़हम बाक़ी रहे। जामे-क़ौसर तक न पहुंचे पंजगाना लोग भी हश्र के मैदान में साबित-क़दम बाक़ी रहे। नफ़रतों का सिलसिला भी ख़त्म होने से रहा इस ज़मीं पे जब तलक दैरो-हरम बाक़ी रहे।


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