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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 62, जून(प्रथम), 2019

मुद्दतों बाद चाँद निकला है

यूसुफ़ रईस

कोई दीवारो-दर नहीं मांगे इन परिंदों ने घर नहीं मांगे। आप क्यूँ रास्ता बताते हो हमने तो राहबर नहीं मांगे। मुद्दतों बाद चाँद निकला है अब कोई भी सहर नहीं मांगे। मेरी महरूमियाँ ये कहती हैं अब दुआ मुख़्तसर नहीं मांगे। मुश्किलें हम सफ़र रहीं मेरी मैंने आसाँ सफ़र नहीं मांगे। दिल के वीरान हो चुके खंडहर अब किसी का गुज़र नहीं मांगे। मेरा दरिया से दोस्ताना था मैंने लेकिन गुहर नहीं मांगें ।


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