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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



रात


सुशांत सुप्रिय


शाम ढल गई थी । रात का पंछी पंख पसारने लगा था । पिता अपने ढाई साल के बच्चे के साथ सड़क पर टहल रहा था । पश्चिमी क्षितिज पर छाए गुलाबी बादलों में प्रकृति का चित्रकार अब काला रंग भर रहा था।

" पापा , रात में अँधेरा होता है ? "

" हाँ , बेटा । "

" पापा , रात में कुछ नहीं दिखता ? "

" हाँ , मेरे बच्चे । "

इस घटना के कुछ दिनों बाद बच्चा अपने खिलौने से खेल रहा था । खेलते-खेलते उसका खिलौना संदूक के नीचे चला गया । पिता पास बैठा अख़बार पढ़ रहा था ।

" पापा , पापा । मेरा खिलौना अंदर चला गया है । निकाल दो । "

" बेटा , नीचे झुको और हाथ अंदर डाल कर खिलौना निकाल लो । अब तो आप बड़े हो रहे हो । शाबाश । "

बच्चा ज़मीन पर लेटकर संदूक के नीचे देखने लगा । पर उसने अपना हाथ अंदर नहीं डाला । उसकी आँखों में भय की महीन रेखा उभर आई ।

" पापा , अंदर रात है । अँधेरा है । "

पिता यह सुनकर मुस्कराया । वह बच्चे को खिडकी के पास ले गया ।

" बेटा , देखो । अभी दिन है , रात नहीं । सूरज आकाश में चमक रहा है । चारों ओर रोशनी है । "

फिर वह बेटे के साथ ज़मीन पर बैठकर झुका और उसे संदूक के नीचे दिखाते हुए बोला -- " अंदर अँधेरा तो है पर रात नहीं है , बेटा । ज़रूरी नहीं कि जहाँ अँधेरा हो , वहाँ रात भी हो । "

बच्चे को उसका खिलौना मिल गया था । वह खेलने में मस्त हो गया ।

समय का रथ अबाध गति से चलता रहा ।

तीस साल बीत गए । अब बेटा बड़ा हो गया था । वह नौकरी करने लगा था । उसकी शादी हो गई थी और उसका एक बच्चा भी था ।

पिता अब बूढ़ा हो गया था । बुढ़ापा अपने-आप में ही बीमारी होती है । ऊपर से उसकी आँखों में मोतियाबिंद उतर आया था । सब धुँधला-धुँधला लगता था । आँखों के आगे अँधेरा-सा छाया रहता था । वह पिछले छह महीनेसे बेटे से कह रहा था , " बेटा , मुझे किसी डॉक्टर को दिखा दो । मेरा ऑपरेशन करवा दो । ठीक से दिखता नहीं है । कई बार ठोकर खा कर गिर चुका हूँ । घुटने छिल गए हैं । धोती फट गई है । आँखों की रोशनी बुझती जा रही है... "

पर बेटा अपने जीवन में व्यस्त था । वह एक बहु-राष्ट्रीय कंपनी में मैनेजर था । दिन कंपनी के नाम था । रात बीवी-बच्चे के नाम थी । पिता के लिए उसके पास समय नहीं रह गया था । पिता घर में पड़े किसी फ़ालतू सामान-सा उपेक्षित जीवन जी रहा था ।

एक दिन बेटा हमेशा की तरह देर-शाम दफ़्तर से घर पहुँचा । अपने बेड-रूम में जाते हुए उसने पिता के कमरे में झाँका । । वहाँ अँधेरा था । उसने ध्यान से देखा । पिता अँधेरे में ही बिस्तर पर बैठा था । उससे रहा नहींगया -- " क्या , पिताजी ! शाम ढल चुकी है । रात हो गई है । और आप कमरे में अँधेरा किए बैठे हैं । कम-से-कम उठ कर लाइट तो जला ली होती । यह इंसानों के रहने का घर है । शाम के समय घर में बत्ती नहीं जलाना अपशकुनमाना जाता है । "

और इतना कह कर उसने कमरे की बत्ती जला दी । कमरे में उजाला हो गया ।

पिता ने चाहा कि वह कहे -- " बेटा , मेरा सूरज तो तू था । जब तूने ही मुझसे मुँह मोड़ लिया तो मेरे जीवन में कैसी रोशनी ? तूने कमरे में तो उजाला कर दिया पर मेरे भीतर जो अँधेरा छा गया है , मेरे जीवन में जो रात उतरआई है , उसे कौन-सा बल्ब दूर करेगा ? "

पर बेटा तब तक अपने कमरे में लौट गया था । अचानक पिता तीस साल पीछे चला गया जब बेटे का खिलौना संदूक के नीचे चला गया था और बेटे ने उससे कहा था -- " पापा , अंदर रात है , अँधेरा है । "

उस दिन उसने बेटे को समझाया था -- " बेटा , ज़रूरी नहीं कि जहाँ अँधेरा होता है , वहाँ रात भी हो । "

पर आज उसे लगा कि शायद तब बेटे ने ठीक कहा था । जहाँ अँधेरा होता है , वहाँ रात भी होती है । उसकी आँखों में अँधेरा भरा हुआ था । और उसके मन में एक अंतहीन रात उतर आई थी । पर यह कैसा अँधेरा था , यह कैसी रात थी जिसमें उसे अपना भूत और भविष्य -- सब साफ़-साफ़ दिखाई दे रहेथे ?


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