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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



उतरन


सरिता सुराणा


अग्रवाल साहब के घर आज सुबह से ही खूब चहल-पहल थी।सब जल्दी-जल्दी अपने काम सलटा रहे थे, क्योंकि आज बम्बई से बड़ी बुआजी आ रही थीं। अग्रवाल साहब का बेटा उन्हें लेने के लिए एयरपोर्ट गया हुआ था। बुआजी के सबसे छोटे बेटे की शादी तय हो गई थी और वे यहां पर भात न्यौतने आ रही थीं।वे जब भी यहां आतीं, सबके लिए अपने बेटे-बहुओं के पहने हुए पुराने कपड़े भतीजे-भतीजियों और बहुओं के लिए लेकर आतीं। अग्रवाल जी की आर्थिक स्थिति उतनी अच्छी नहीं थी, इसलिए सब बुआजी के लाए हुए पुराने कपड़े भी खुशी-खुशी रख लेते थे।

जैसे ही बुआजी घर आईं, सब उनकी आवभगत में लग गए। घर में सबसे छोटी बहू रजनी भी बुआजी की सेवा में लगी थी।जब बुआजी ने सूटकेस खोलकर सबको एक साथ बुलाकर कपड़े बांटे तो सबने बड़ी खुशी से उनको ले लिया लेकिन रजनी को उनमें कोई रुचि नहीं थी।यह देखकर बुआजी को अजीब-सा लगा। उन्होंने उसे बुलाकर एक साड़ी देते हुए कहा- 'बहू, ये साड़ी मेरी मंझली बहू की है, एकदम नई है, तुम पहन लेना । शादी में अच्छी लगेगी।अब क्या है ना, मेरी बहुएं तो नित-नई साड़ियां खरीदती रहती हैं और तुम लोग तो नहीं खरीद सकतीं। मुझे भी अपने मायके की इज्जत प्यारी है, इसलिए तुम सबके लिए कुछ न कुछ लेकर आई हूं।

रजनी ने बड़े ही संयत स्वर में कहा- ' बुआजी! मेरी इज्जत तो इस सूती साड़ी में है, जो आपके भतीजे ने लाकर दी है। किसी की ' उतरन ' पहनने से तो अच्छा है कि हम अपनी क्षमतानुसार ही कपड़े पहनें।'

बुआजी रजनी का मुंह देखती रह गईं।


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