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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



कब तक बोलो ....


सुशील यादव


                                                                                                          
कब तक बोलो ,
हम अपने कन्धों पर 
विवशताओं का रेगिस्तान 
उठाये चलें ....? 
अपनी प्यास 
भावनाओं की मरीचिका से 
कहाँ तक बहलाये चलें .... 
किस दिशा में 
तलाशे पत्थर 
माथा किधर अपना पटकें ....?
आखिरी हर्फ जिस  
कलम से लिख चुके 
और कितना झटकें ....?
सुना है,  
नई व्यवस्था के नाम,  
मील के सभी पत्थरों को 
मन्दिरों में तुमने कैद कर लिया है 
ये ...
तुम्हारे इशारों पर नाचते हैं 
तुम्हारी 
सुरक्षा के कवच 
नए -नए मुहावरों में 
साँचते-
बांचते हैं ....
....बताओ ,
ऐसे में हमें 
'दिकबोध' कहाँ हो 
सफर ,कितना हमने   'तय' किया 
कितना हम 'निकल' आये
ले ली है ,
तुमने शायद 
पैदायशी शपथ, 
नहीं होओगे 
किसी 'तरस' पर   
अनावृत 
नहीं दिखाओगे  
किसी सुविधा-सहानुभूति  
के आगे 
हसीं चलचित्र ....
हाँ इतना सच है ,
केवल देखने को हम शापित रहेगे 
तुम्हारा दागदार 
चरित्र ....
पता नहीं आगे 
कितनी सदियों  तक ... ? 

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