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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



स्पर्श


सुशांत सुप्रिय


                                                                                                          
धूल भरी पुरानी किताब के 
उस पन्ने में 
बरसों की गहरी नींद सोया 
एक नायक जाग जाता है 
जब एक बच्चे की मासूम उँगलियाँ 
लाइब्रेरी में खोलती हैं वह पन्ना 
जहाँ एक पीला पड़ चुका 
बुक-मार्क पड़ा था 

उस नाज़ुक स्पर्श के मद्धिम उजाले में 
बरसों से रुकी हुई एक अधूरी कहानी 
फिर चल निकलती है 
पूरी होने के लिए 

पृष्ठों की दुनिया के सभी पात्र 
फिर से जीवंत हो जाते हैं 
अपनी देह पर उग आए 
खर-पतवार हटा कर 

जैसे किसी भोले-भाले स्पर्श से 
मुक्त हो कर उड़ने के लिए 
फिर से जाग जाते हैं 
पत्थर बन गए सभी शापित देव-दूत 
जैसे जाग जाती है 
हर कथा की अहिल्या 
अपने राम का स्पर्श पा कर 

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