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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



एक दिन


सुशांत सुप्रिय


                                                                        
एक दिन 
मैंने कैलेंडर से कहा --
आज मैं मौजूद नहीं हूँ 
         और अपने मन की करने लगा 

एक दिन मैंने 
कलाई-घड़ी से कहा --
आज मैं मौजूद नहीं हूँ 
          और खुद में खो गया 

एक दिन मैंने 
बटुए से कहा --
आज मैं मौजूद नहीं हूँ 
          और बाज़ार को अपने सपनों से 
                        निष्कासित कर दिया 

एक दिन मैंने 
आईने से कहा --
आज मैं मौजूद नहीं हूँ 
           और पूरे दिन उसकी शक्ल नहीं देखी 

एक दिन 
मैंने अपनी बनाईं 
सारी हथकड़ियाँ तोड़ डालीं
अपनी बनाई सभी बेड़ियों से 
आज़ाद हो कर जिया मैं
एक दिन 
  

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