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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



क्या जीवन ऐसे ही चलता है।


सत्येन्द्र कुमार


                 
मेरे घर का एकलौता कोना
बेघर सा छत का एक कोना
सुबह शाम तो रोज आती है 
पर यहाँ धूप नही आती है

अपने जीवन पथ पर उसने 
सिर्फ एक रस ही देखा है
उसी में हँसते देखा है
और उसी में रोते देखा है।

दीवारों और छते के बीच 
पिस रहा है बदनसीब वह
कोई नही जो पूँछे उसे 
पर उसे है खबर सब की

दिन भर के दुख को लेकर 
जब मैं भी छत पे आता हूँ तो
दोनों के मन में होता है एक ही सवाल
क्या जीवन ऐसे ही चलता है.....
क्या जीवन ऐसे ही चलता है.....।

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