Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



तुम को ही ढूंढ़ा करती थी


रवि प्रभात


                 
पूरे आठ पहर मेरी नज़रें 
तुम को ही ढूंढ़ा करती थी 
छोटी सी आहट पर भी नजरें
तुम को ही ढूंढ़ा करती थी 
एहसास पास होने का था 
पर नज़रें उदास ही रहती थी 
तेरी बेरुखी की आदत भी 
उदास मुझे कर जाती थी
इसी चाह में कि
दिख जाओ तुम मुझे एक बार 
बारम्बार मैं पलटा करता था 
पर वही खालीपन
और वही ख़ामोशी 
मुझे मुँह चिढ़ाया करती थी
पूरे आठ पहर मेरी नज़रें
तुम को ही ढूंढ़ा करती थी 

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें