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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



बेरोजगारी का स्वरुप विकराल होगा


रंजन कुमार प्रसाद


                 
हैवानियत की चश्मा जिनके आँखों पर होगा
उन्ही लोगों की वजह से मानव शर्मसार होगा
भारत में बढती आबादी का स्वरूप विकराल होगा
तो बेरोजगारी का स्वरूप और भी विकराल होगा।

आज जिधर भी देखिये बेरोजगारी ही बेरोजगारी है
नमक दाल रोटी चलाने में भी मारा मारी है
यही हालात रही तो मौसम भी भयावह होगा
भारत में बढ़ती आबादी का स्वरूप विकराल होगा।

जिंदगी में गम खाकर पिसते है सत्ता के गलियारों में
वोट बैंक की खातिर नेता गिर जाते है अँधियारो में
यही हालत रही तो चारो तरफ भयानक अंधकार होगा
भारत में बढ़ती आबादी का स्वरूप विकराल होगा।

सत्ता में शिक्षा मसले पर अघोषित युद्ध चल रहा है
सत्ता के गलियारों में हरेक नेता मौन साध रहा है
यही हालात रही तो गरीबों में  शिक्षा का अंधकार होगा
भारत में बढ़ती आबादी का स्वरुप विकराल होगा।

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