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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



माँ


डॉ. प्रमोद सोनवानी "पुष्प"


                 
माँ , ओ मेरी माँ ....
तू ही है मेरी मरियम ,
तू ही मेरी सीता है ।
श्रीकृष्ण जो उपदेश दिये ,
बस , तू वही ओ गीता है ।।

चलती थी दुर्गम राहों में ,
पाँव में चुभे कई काँटे थे ।
दर्द नहीं होती थी मुझको ,
जेहन में तेरी ओ बातें थे ।।
जेहन में मुझे छुपा लेती ।
बस , तू ही स्नेह लता है ।।
श्रीकृष्ण जो .............।।1।।

तेरी ममता को पाने के लिये ,
हाय , कब नहीं मैं तड़पी हूँ ।
सारी दुनियां छोड़ - छाड़कर ,
तेरी आँचल की ओर दौड़ी हूँ ।।
आँचल में मुझे छुपा लेती ।
बस , तू ही भाव प्रीता है ।।
श्रीकृष्ण जो ................।।2।।

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