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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



सुरसा


डां नन्द लाल भारती


 
वो दिन वो रात याद हैं बाबू,
जल उठता था दीया भोर मे
चौखट पर जब..............
दादा जुट जाते थे
करने सानी पानी 
गाते थे निर्गुण सुहावन
भोर हो जाती थी लुभावन.......
दादा बैलों के कान मे कहते
उठ जा अब धीरु वीरू
कर लो दाना पानी
हो गया सानी पानी.......
बज उठती थी बैलों की घण्टी
दादा भी लेकर बैठ जाते थे
हुक्का
टूटी खाट हो या मचिया पुरानी....
मुंह उठाया जब बैलों ने
हौदी से
दादा बुझ जाते थे आसन
बैलों के...........
दुलारते पीठ थपथपाते
पहना देते थे जुआठ की माला
बैल धारण कर ये काठ का गहना
चल पड़ते थे खेत की ओर
खुद दादा  हल कंधे पर लादे
पीछे पीछे चलते
पंक्षी गाते चल उठ मुसाफिर
हो गई भोर.......
भोर मे बैलों की घण्टी खूब भाती थी
मंदिर की घण्टी मस्जिद की अजान
जैसी सुहाती थी........
सब कुछ बदल गया है अब
बाजार युग है अब प्यारे .........
लद गए दिन मेहनत के
जीने की आदत पड़ गई
मशीन युग मे.............
काश हल बैल और धरती से
रिश्ता कायम रहता
ना स्वार्थ की सुरसा होती
ना बैल ठीहे पर, ना किसान
सूली पर चढता........
 

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