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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



बोन्साई


मल्लिका मुखर्जी


 
यौवन की दहलीज पर क़दम रखते ही 
सपनों के पर निकल आए,
उम्मीदें लहराने लगीं मन-आकाश में, पर 
यथार्थ को छूते ही समझ में आ गया।
मेरा होना कोई मायने नहीं रखता इस जहाँ में,
एक मुठ्ठी आसमाँ भी मेरा नहीं हो सकता। 
कतरने लगी मैं सपनों की टहनियां, 
दूर होती गई जीवन की खिली धूप से। 
अब बारी थी इरादों की। 
इरादे वटवृक्ष बन फ़ैलाने लगे थे 
अपनी जड़ें हवाओं में भी,
यदि समय से नहीं रोका गया तो!
जड़ों की भी कर दी कुछ कटाई-छटाई
अपने अस्तित्व के आकार को क़ाबू करने का 
तरीका आ गया मुझे।
फिर सज गई हक़ीकत की खिड़की पर 
सुन्दर बोनसाई बन।
ख़ुद को बहलाना तो सीख ही लिया है मैंने, 
अब नए आकार में ढलकर भी तो देखूं!
 

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