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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



व्यवस्था


डॉ दिग्विजय कुमार शर्मा "द्रोण"


 
यहाँ सिर्फ जिस्म बिकता है , साहब!
ईमान खरीदना हो तो 
अगले चौक पर 'पुलिस
स्टेशन' हैं।
आप चाहते हैं,
कि 
आपकी तानाशाही चले 
और कोई आपका
विरोध न करे,
तो आप भारत में 
न्यायाधीश बन जाइये।
आप चाहते हैं,
कि 
आप लोगों को बेवजह पीटें 
लेकिन कोई आपको
कुछ न बोले,
तो आप पुलिस वाला बन जाइये।
आप चाहते हैं,
कि 
आप एक से बढ़कर एक
झूठ बोलें अदालत में,
लेकिन कोई आपको सजा न दे,
तो आप वकील बन जाइये।
आप चाहते हैं,
कि 
आप खूब लूट मार करें,
लेकिन कोई आपको डाकू न बोले,
तो आप भारत में राजनेता बन जाइये।
आप चाहते हैं,
कि 
आप दुनिया के हर सुख 
मांस, मदिरा, स्त्री
इत्यादि का आनंद लें,
लेकिन कोई आपको भोगी न कहे,
तो धर्मगुरु बन जाइये।
आप चाहते हैं,
कि 
आप किसी को भी बदनाम कर दें,
लेकिन आप पर कोई मुकदमा न हो,
तो मीडिया में रिपोर्टर बन जाइये।
यकीन मानिये..
कोई आपका बाल बाँका 
तक कोई नहीं कर पाएगा
भारत में,
हर 'गंदे' काम के लिए 
एक वैधानिक पद उपलब्ध
है।
आप चाहते हैं, कि
मैँ चाहे जो करूँ और
बड़े मजे से उसे अंजाम दे देते है
यहां देख कर अनदेखा किया जाता है
ऐसी हमारे भारत की व्यवस्था है।
आप चाहते हैं, कि
मैं एक अच्छा कम करूँ
और एक सङ्कल्प लूँ
स्वयम से बेदाग़ पाक साफ रहूँ
तभी स्वयम का विकास और 
अच्छे राष्ट्र का निर्माण हो सकता है।
 

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