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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



हूल की आग जली


चन्द्र मोहन किस्कु


 
जब छीन
उजाड़ रहे थे
लोगों का घर,आंगन
कपड़े-लत्ते
हरियाली जंगल
खेत-खलिहान
और मिट्टी के अंदर का पानी
तब हूल की आग जली
काला धुँआ निकला
आसमान की ओर
जब छीन रहे थे
विकास के नाम पर
लोगों काहक़ और अधिकार
जब कुचल रहे थे गाड़ी से
निर्धन-गरीब लोगों को
चौड़ी सड़क पर,
सब कुछ खोकर
भाग रहे थे लोग
आँसू से छाती
भिगो रहे थे
तब हूल की आग जली
और काला धुँआ निकला
आसमान की ओर
जब लोगों को
मार रहे थे
लाल खून गिरा रहे थे
धरती पर
जब लोगों को
जात के नाम पर
धर्म के नाम पर
बाँट रहे थे
तब हूल की आग जली
और काला धुँआ निकला
आसमान की ओर.

*हूल एक संताली शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ क्रांति होता है


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