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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



यज्ञ


बृजेश पाण्डेय 'बृजकिशोर'


 
अंतःकरण की शुचिता
वातावरण की पवित्रता
यज्ञ से जल वृष्टि होता
जलवृष्टि से मन हर्षता।

शक्ति की संवृद्धि हो
यश कीर्ति की वृद्धि हो
सत्य न्याय बलिष्ठ हो
यज्ञ में आहुति से।

यज्ञ का आयोजन हो
सृष्टि के कल्याणार्थ।
आहुति राग-द्वेष  हो
उद्देश्य से सद्भावार्थ।।

परिकल्पना सन्मार्ग की
प्रेम पूर्ण संसार की।
निज निज कुत्सित विचार की
त्यागपूर्ण भावना की।।

यज्ञ से जो धूम्र उठे
वसुधा के अनुकूल उठे।
कुटुम्ब भाव हृदय भरे
शिव शिव शिव करें।।

शुद्ध सात्विक कामना
हिंसा वृत्ति को त्यागना।
सद्कृत्य की सराहना
केवल यही आराधना।।

दुष्कर्म दूर दुर्भावना
शुभकर्म शुभकामना
चरित्र हो उज्ज्वल मेरा
यही देव से प्रार्थना।

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