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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



चुप


भास्कर चौधुरी


 
ऐसा
पहली बार हो रहा है 
कि मैं चुप हूँ
और तुम बोल रही हो 

लगातार....

सदियों से
मैं बोलता रहा हूँ
और तुम चुप !

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें