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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



तुम्हे खामोश रहना होगा


डॉ० अनिल चड्डा


 
तुम्हे कोई हक नहीं
अपनी बात कहने का
तुम्हारा तो काम है
हरेक ज्यादती सहने का
तुम्हे तो बस
खामोश रहना होगा
तुम्हे नही पढ़नी है
दीवारों पर लिखी इबारत
तुम्हे नही लिखनी है
अपने मन की हालत
तुम्हे तो बस 
खामोश रहना होगा
खुले रखने है तुम्हे
अपने घर के सारे दरवाजे
हवाओं को खुलेआम
आने-जाने देना होगा
किसी तूफान की आहट भी
नहीं सुननी है
तुम्हे तो बस 
खामोश रहना होगा
खामोशी में
कितनी शांति है
नहीं कोई भ्रांति है
बस एक जून
पेट भर जाये
खुला आसमान 
सोने को मिल जाये
अपने सपनों को
किसी से मत कहना
तुम्हे तो बस
खामोश रहना होगा
खामोश ही रहना होगा 

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