Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



लहरा रही पाती


हरिहर झा


 
खत्म इंतजार,  
प्रेम की लहरा रही  पाती ।  

हाथ में कागद, 
कोई अदृष्य शक्ति खीचती
डर, चुडैलों का  वन में,     
आँखे हमारी मींचती
संज्ञान, 
अब एक क्षण ,रूक जाना है विकट 
गोल गोल राह मगर  
मंजिल कितनी है निकट 
देखता सूरज,   
धरती घूम कर, कहाँ जाती।  

सुहावनी हवा बहती, 
दिल्ली  अब  दूर नहीं      
खुशियों के ठहाके 
मस्त, छाये है हर कहीं 
गुनगुना रहे भँवरों की    
बातें हैं अनकही             
क्यारियों में कलियों को 
गुदगुदी क्यों हो रही 
देख कर बसंत, 
गीत,  कोयल किस लिये गाती  
		 
 

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें