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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



विकल हृदय तू क्यूँ उदास है


डॉ. दिवाकर दत्त त्रिपाठी


   
विकल हृदय तू क्यूँ उदास है ।
कुछ दिन का अज्ञातवास है ।

कुछ   घंटो की  अमा  घनेरी ।
आयेगी   प्रभात  की     फेरी ।
कुछ क्षण ठहर,धैर्य धारण कर ,
बात  मान  ले यह  तू,  मेरी ।

ऊषा के रक्तिम आँचल में ,
प्राची का स्वर्णिम उजास है ।
कुछ दिन ..................

पतझड़  आया   है,   जायेगा ।
फिर रितुराज नवल  आयेगा।
मधुप मान ! फिर फूल खिलेंगे,
कली कली  पर   तू   गायेगा !

अनावृत्त तरुओं के उर में,
पनप रहा एक नव विकास है ।
कुछ दिन का...................

यह प्रतिकूल समय सह  कंचन !
कभी न भारी कर तू निज मन !
तेरा    मोल    जौहरी    जाने,
क्या  जानें यह साधारण  जन ?

वो  ही  तेरा  मोल  करेगा 
वृथा हृदय करता निराश है ।
कुछ दिन.......................

समय चक्र अनवरत चलेगा ।
सुबह का उदय, शाम ढलेगा।
जहाँ आज निर्जन कानन है,
कल कोई पुरधाम पलेगा ।

वहाँ   बसेंगे   भूखे  नंगे,
जहाँ महाजन का निवास है ।
कुछ दिन का................

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