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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



कलम ! दर्द से रुक मत जाना


डॉ. दिवाकर दत्त त्रिपाठी


   
कलम ! दर्द से रुक मत जाना ,
फुटपाथों  की  पीर  लिखूँगा ।

देख  अन्नदाता  के  चेहरे !
आखिर क्यों है इतने उतरे ?
इनकी पीड़ा कहाँ सुनेंगे ,
लोकतंत्र के शासक बहरे ?

हर मजबूरी मे जो बरसा ,
वो नैनों का नीर लिखूँगा ।
कलम ! दर्द से.............

पेट बड़े हैं ,कम मजदूरी ।
हिस्से में केवल मजबूरी ।
ख्वाब सजाना बेइमानी है,
तन पर चीर नही जब पूरी ।

इन     भूखे,  नंगे   लोगों   की ,
अगर लिख सका ,चीर लिखूँगा।
कलम! दर्द ...........

जनसेवक अब मालदार है।
जनता के सर पर उधार है।
गधे पंजीरी काट रहे हैं ,
यह आखिर कैसी बहार है।

लक्ष्य करे जो भ्रष्ट नीति को ,
ऐसा कोई  तीर  लिखूँगा ।
कलम! दर्द............

कुत्ते दुग्धपान करते हैं ।
एसी,कूलर में रहते हैं।
भूखे सो जाते हैं मानव,
बिना दवाई के मरते हैं ।

इंसानों की फूटी किस्मत,
कुत्तों की तकदीर लिखूँगा।
कलम!दर्द................

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