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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



दर्द मैं पीता जाऊँ


डॉ० अनिल चड्डा


 
सब्र की चादर ओढ़ कर,
दर्द मैं पीता जाऊँ,
तेल से है जलता दीया,
मैं यूँ ही जलता जाऊँ।

कौन बतायेगा मुझे,
क्या सही है, है गल्त क्या,
पाप किसे कहते यहाँ,
पुण्य का मतलब क्या हुआ,
मुँह फेर, बंद आंखें किये,
मैं जग में चलता जाऊँ।

बीते दिन, रातें गईं,
कोई राह नहीं मिलती नई,
कहीं फूल, कहीं काँटे मिलें,
पथरीली कहीं राह मिल गई,
अविचल अपनी राह मैं,
निरन्तर ही बढ़ता जाऊँ। 

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