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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



सब पड़ा रह जाएगा


संजय कुमार गिरि


                 
जिंदगी भर जो कमाया सब पड़ा रह जाएगा 
काम की खातिर सदा ही दौड़ता रह जाएगा

नेकियाँ करते नहीं हैं जो गरीबों के लिए 
काम नेकी का करो तुम सब धरा रह जाएगा

प्रेम से मिलजुल रहो सब मत करो यूँ दुश्मनी 
काम गर कोई पड़ा तो बस पड़ा रह जाएगा

डर गया कोई परिंदा गर उड़ा न आसमां 
चोंच में का एक दाना ही बचा रह जाएगा

घर से' निकले थे कमाने चार पैसे हम कभी 
क्या पता था गाँव पीछे छूटता रह जाएगा

जिंदगी भर मैं सदा सद्मार्ग पर चलता रहा 
है पता मुझको यहाँ मेरा किया रह जाएगा

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