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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



कभी तो जुल्म पर कुछ फैसला होगा


नवीन मणि त्रिपाठी


 
कफ़स में ख़्वाब उसको आसमाँ का जब दिखा होगा ।
परिंदा    रात   भर   बेशक़   बहुत  रोता  रहा   होगा ।

कई  आहों  को  लेकर  तब  हजारों  दिल  जले  होंगे । 
तुम्हारा  ये  दुपट्टा  जब   हवाओं   में   उड़ा    होगा ।।

यकीं   गर   हो  न  तुमको  तो  मेरे  घर देखना आके।
तुम्हारी   इल्तिज़ा  पे  घर  का  दरवाजा  खुला  होगा ।।

रकीबों   से   मिलन  की  बात  मैंने  पूछ  ली   उससे।
कहा  उसने  तुम्हारी  आँख  का  धोका  रहा  होगा।।

बड़े  ख़ामोश  लहज़े में  किया  इनकार था  जिसने ।
यकीनन  वह   हमारा  हाल   तुमसे  पूछता  होगा ।।

उठाओ रुख़ से मत पर्दा यहां आशिक  मचलते  हैं ।
तुम्हारे  हुस्न  का  कोई  निशाना  बारहा   होगा ।।

तबस्सुम   आपका   साहब  हमारी  जान   लेता  है ।
अदालत में कभी तो जुल्म पर  कुछ फैसला होगा।।

चले  आओ   हमारी   बज़्म   में  यादें   बुलाती   हैं ।
तुम्हारा  मुन्तज़िर  भी  आज  शायद  मैक़दा  होगा ।।

अगर है  इश्क़  ये  सच्चा  तो  फिर वो मान जायेगी । 
मुहब्बत में भला कैसे  कोई  शिक़वा  गिला   होगा ।।

बड़ी  आवारगी  की  हद  से  गुज़री  है मेरी ख्वाहिश ।
तुझे  कैसे  बताऊं  इश्क़  में  क्या  क्या  हुआ  होगा ।।

वो पीता छाछ को अब फूंककर  कुछ दिन से है देखा।
मुझे  लगता  है शायद  दूध  से  वह  भी  जला होगा ।।

किया था फ़ैसला उसने जो बिककर ज़ुल्म के हक़ में ।
ख़ुदा   की  मार  से  यारों  वही   रोता मिला  होगा ।।

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