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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



भरोसा कहाँ रह गया आदमी को


नवीन मणि त्रिपाठी


 
वो जब  भी  चला    छोड़ने   मैकशी   को ।
अदाएं     जगा   कर    गईं   तिश्नगी   को ।।

बयाँ  हो   गयी   आज   उनकी   कहानी ।
छुपाते   रहे   जो   यहां    दुश्मनी    को ।।

अमीरों की महफ़िल में सजधज के जाना ।
वो   देते   नहीं   अहमियत   सादगी  को ।।

खुदा  की  नज़र  है  हमारे  करम   पर ।
भरोसा  कहाँ   रह   गया  आदमी को।।

पकड़ कर उँगलियों को चलना था सीखा।
दिखाते   हैं  जो   रास्ता  अब  हमी   को ।

मुहब्बत   हुई  इस  तरह   आप   से  क्यूँ ।
अभी  तक  न  हम  जोड़  पाये कड़ी को ।।

मेरे  कत्ल  का  कर  गए  फ़तवा  जारी ।
जो  कल  दे  रहे  थे  दुआ  जिंदगी  को ।।

अदब   काफिया   बह्र   सब  हैं  नदारद ।
जनाजे  पे  वो   रख   रहे  शायरी  को  ।।

मुहब्बत  को   जिसने  तबज्जो नहीं   दी ।
वो  तरसा बहुत उम्र  भर  इक ख़ुशी को ।

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