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वर्ष: 2, अंक 38, जून(प्रथम), 2018



ज़ख़्म दिखाया नहीं कभी


अरविन्द कुमार 'असर '


 
कितना छुपा है दर्द बताया नहीं कभी
मैने किसी को ज़ख़्म दिखाया नहीं कभी

बेशक़ कोई चराग़ जलाया नहीं ,मगर
जलता हुआ चराग़ बुझाया नहीं कभी

हम जिसके साथ साथ रहे साये की तरह
उसने हमारा साथ निभाया नहीं कभी

इन्सान पे करूँगा भला ज़ुल्म किस तरह
मैने तो फूलों को भी सताया नहीं कभी

बचपन मे भी, शरारती होने के वावजूद
फूलों से तितलियों को उड़ाया नहीं कभी

मेरे लिए ये एक इबादत से कम नहीं
मेयार आशिक़ी का गिराया नहीं कभी

क्या जाने कौन बात मेरी उसको चुभ गई
रूठा तो फिर वो लौट के आया नहीं कभी

वो बादशाह था ,तो था मैं भी ' असर' फ़क़ीर
सर अपना उसके आगे झुकाया नहीं कभी

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