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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 65, जुलाई(द्वितीय), 2019

कैद या रिहाई

आशीष श्रीवास्तव

एक बंगले में पिंजरे में बंद मैना और एक पेड़ से उड़कर बंगले की खिड़की पर आकर बैठी मैना में संवाद ।

पिंजरे वाली मैना: ‘‘और बहिन क्या हाल हैं आजकल, क्या चल रहा है ?’’

खिड़की वाली मैना: ‘‘कहां? अब जंगल तो बचे नहीं, पेड़ भी गायब होते जा रहे हैं, दाने-पानी को बहुत भटकना पड़ता है।’’

पिंजरे वाली मैना: ‘‘तुमसे कहा तो था, कोई अच्छा-सा पिंजरा देख लो, समय पर खाना-पीना और चंद अंग्रेजी के शब्द बोलकर मजे करतीं, पर तुम रहीं वही अपनी मर्जी की मालिक।

खिड़की वाली मैना: ‘‘बहिन, कोई रास्ता हो तो बताओ न, क्या करें ऐसे हालात में !!

पिंजरे वाली मैना: ‘‘तुम बचपन की सहेली हो, इसलिए बता रही हूंॅं दूसरे पक्षियों को तो मैं मुंह भी नहीं लगाती। ध्यान से सुनो! कुछ महीने पहले ही मालकिन के बेटे की शादी हुई है, बेटे-बहू रात में अलग घर में जाने की खुसुर-पुसुर कर रहे थे, वहां मौका मिल सकता है! आते रहना।‘‘

(तभी अंदर से मालकिन की धीमे से तेज होते हुए आवाज आई)

मालकिन: मिट्ठू-मिट्ठू तोता...... मिट्ठू-मिट्ठू तोता......

खिड़की वाली मैना: ‘‘अच्छा उड़ती हूं फिर मिलेंगे’’

पिंजरे वाली मैना: ‘‘ठीक है, और सुनो अबकी बार कुछ ताजे अमरूद अपने पेड़ के लेते आना। यहां तो पिज्जा, बर्गर, चाऊमीन खाकर बोर हो गयी।’’

खिड़की वाली मैना: (उड़ते हुए) कह रही है, अंग्रेजी सीख और हो जा कैद पिंजरे में।’’ वो पढ़ी-लिखी और हम आवारा। वाह !! क्या जमाना आ गया है, आजकल तकलीफ बताओ तो भी सब फायदा उठाने की ही सोचते हैं !!


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