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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 65, जुलाई(द्वितीय), 2019

ए ज़िन्दगी मैं तुझसे मुँह मोड़ आई हूँ

सपना परिहार

तम्मनाओं की मज़ार पर दो फूल छोड़ आई हूँ ए ज़िन्दगी मैं तुझसे मुँह मोड़ आई हूँ। न खुश हूँ, न किसी से खफा हूँ, बस सभी से थोड़ी जुदा हूँ, हसरतों की वो हर दीवार में तोड़ आई हूँ, ए ज़िन्दगी मैं तुझसे मुँह मोड़ आई हूँ। न कसमें साथ थी, न रस्में साथ है, बस थोड़े हसीन लम्हें साथ है, वो दर्द भरी सौगात मैं पीछे छोड़ आई हूँ, ए ज़िन्दगी मैं तुझसे मुँह मोड़ आई हूँ। शिकवा नही है उससे , शिकायत भी कुछ खास नही है, जिंदगी की कशमकश में बस वो अब साथ नही है, सबकी खुशियों की दुआ मैं रब के दर पे छोड़ आई हूँ, ए ज़िन्दगी मैं तुझसे मुँह मोड़ आई हूँ। मुकम्मल तो सब कुछ यहाँ होता नही है, सब का सब कुछ यहाँ खोता नही है, अपनी कश्ती को किनारे तक छोड़ आई हूँ, ए जिंदगी मैं तुझसे मुँह मोड़ आई हूँ। दुनियाँ की रीत भी अजब-गजब है, सबके अपने फलसफे और अपने सबब है, अच्छे -बुरे सबक सब पीछे छोड़ आई हूँ, ए ज़िन्दगी मैं तुझसे मुँह मोड़ आई हूँ।


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