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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 65, जुलाई(द्वितीय), 2019

थोड़ा खुश हो लेता हूँ

डॉ० अनिल चड्डा

जब भी बीते दिनों की याद आती है उदास होने के बजाय थोड़ा खुश हो लेता हूँ खुश हो लेता हूँ ये सोच कर कि उन दिनों ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है बहुत कुछ दिखाया है सिखाया है गलतियों को न दोहराना किसी को अपना न बनाना दिखाया है जग में तेरे अपने सिवा तेरा कोई नहीं जो तुझे अपना कहते हैं तुझसे प्यार का दम भरते हैं वो ये सब केवल अपने स्वार्थ को करते हैं वो तुझसे प्यार करने का ढोंग केवल इसलिये करते हैं कि उन्हें स्वयं को कोई प्यार करने वाला चाहिए जिसमें वह अपना प्रतिबिम्ब देख सकें केवल अपना प्रतिबिम्ब और कुछ नहीं कुछ भी नहीं


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