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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



सिआटिल की यात्रा का प्रथम दिवस


महेश चंद्र द्विवेदी


यूनाइटेड स्टेट्स आफ अमेरिका के पश्चिमी-उत्तरी कोने पर स्थित वाशिंग्टन स्टेट का सिआटिल नगर माइक्रोसोफ्ट का मुख्यालय होने के कारण आज विश्व प्रसिद्ध हो चुका है. वाशिंग्टन स्टेट को अमेरिकन लोग ‘एवरग्रीन स्टेट’ कहते हैँ, क्योँकि इस प्रांत के वृक्ष शीतकाल में भी हरे रहते हैं. माइक्रोसौफ्ट का मुख्यालय वास्तव में सियाटिल में न होकर रेडमंड काउंटी में है, परंतु निकटस्थ मुख्य नगर होने के कारण प्रसिद्धि सिआटिल की है. मैँ 18 जुलाई, 2013 को पत्नी नीरजा के साथ लंदन से सिआटिल अपने बेटे देवर्षि के पास जा रहा था. लंदन में हीथ्रो एयरपोर्ट पर हमें बी. ए. 49 फ़्लाइट पकड़नी थी. नीरजा को लम्बी दूरी पैदल चलने मेँ असुविधा होने के कारण मैंने उनके लिये व्हीलचेयर ले ली थी. व्हीलचेयर को आगे ढकेलने वाली महिला एक अंगरेज़ थी- शक्ल एवँ शरीर की बनावट से पूर्व प्रधान मंत्री मार्गरेट थैचर जैसी सौम्य एवँ सुंदर. नीरजा के व्हीलचेयर पर बैठते ही वह हमसे सामान्य से अधिक मित्रवत होने का प्रयत्न करने लगी थी, जिससे मुझे लग रहा था कि सम्भवतः वह कुछ टिप प्राप्त करने हेतु प्रयत्नशील है और मैंने उसे टिप देने का मन बना लिया था. जब व्हीलचेयर वायुयान की खिड़की के निकट पहुंची, तो वहाँ अंदर जाने वाले यात्रियोँ एवँ एयरहोस्टेसेज़ की भीड़ देखकर मुझे टिप देने में संकोच होने लगा और यह भी लगा कि कहीं वह लेने से मना न कर दे. पर जब मैंने अपनी जेब में हाथ डाला, तो वह मेरी इस हरकत को कनखियों से देखकर हल्का सा मुस्कराई, जिससे मैं आश्वस्त हो गया. फिर मैंने जैसे ही अपना हाथ जेब से निकाला, उसने चुपचाप अपना बाँयां हाथ पीछे की ओर मोड़ दिया और मैंने भी चुपचाप अपने हाथ के चार पाउंड के सिक्के उसके हाथ मेँ रख दिये, जिसे उसने चुपचाप बंद कर लिया. बात को खुल जाने से बचाने के लिये उसने 'थैंक-यू' नहीं कहा, वरन मुस्कराहट दी और मैँ भी बिना कुछ कहने का समय दिये वायुयान मेँ घुस गया. उस अंग्रेज़ महिला की इस खास हिंंदुस्तानी हरकत पर लंदन से सिआटिल की नौ घण्टे की फ्लाइट में मैं बार-बार मन ही मन मुस्कराता रहा.

सिआटिल एयरपोर्ट पर जब आव्रजन के फार्म में अमेरिका में रुकने का स्थान लिखने को कहा गया, तब उसे पढ़कर मुझे ध्यान आया कि देवर्षि के घर का पता तो हमें ज्ञात ही नहीँ है - केवल उसका फोन नम्बर ही ज्ञात है. वहां मेरा फोन काम नहीं करता था और आव्रजन की सीमा के पहले कोई पे-फोन भी नहीं था. इससे मैं चिंतित हो रहा था. मैंने अपनी समस्या नीरजा की व्हीलचेयर ले जाने वाली महिला से बतायी. यह महिला अश्वेत थी. मेरे मुख पर चिंता स्पष्ट रही होगी, क्योंकि अभी तक उसकी मुद्रा रुक्ष थी. मेरी समस्या सुनकर पहले कुछ देर तक वह कुछ नहीँ बोली. फिर बड़े अहसान का अहसास कराते हुए धीरे-धीरे अपना फोन निकाला और मेरे बेटे का नम्बर पूछकर उसके घर का पता ज्ञात कर मुझे बताया. तब मुझे पता चला कि देवर्षि का घर रेडमंड मेँ है, सिआटिल मेँ नहीँ. फिर एक रसीद-बुक निकालकर उसमें कुछ नोट करते हुए वह कहने लगी कि यह तो लम्बी दूरी का काल है, इसमें काफी पैसे खर्च हुए हैं. मैं समझ गया कि यह कुछ अधिक टिप प्राप्त करने का खास हिंदुस्तानी टाइप का झांसा है. आव्रजन की औपचारिकताओं के पश्चात वह हमें बैगेज-क्लेम पर ले गई. दोनो सूटकेस उठाने में उसने हमारी सहायता की. सूट्केस ट्रौली पर रख जाने के पश्चात मैंने चारों ओर देखा तो पाया कि देवर्षि अभी पहुंचा ही नहीं है. अब उस महिला को छोड़ने का समय था, अतः मैंने अपनी जेब मेँ हाथ डाला. उस समय मेरी जेब में सबसे छोटा नोट बीस डौलर का था, अतः मैंने उसे वही नोट दे दिया. उसे देखकर उसकी आंखों में चमक और होठों पर मुस्कराहट आ गई और वह खुलकर हिंदुस्तानी अंदाज़ में बोली, "आप का बेटा तो अभी आया नहीं है, अतः मैं उसे फिर फोन किये देती हूँ कि आप लगेज-कराउज़ल नम्बर एक पर आ गये हैँ और वहीं प्रतीक्षा कर रहे हैं."

हम लोग जब एयरपोर्ट से चले, तो अपने हिंदुस्तान से कुछ खास अलग प्रकार के नज़ारे दिखाई देने लगे. सिआटिल एवँ रेडमंड मेँ जितनी शहरी चमक-दमक थी, उससे अधिक वहां प्राकृतिक सुंदरता थी- झीलें, जिन्हेँ बिल्डर्स पाट नहीं रहे थे, नदियां, जिनमें फैक्ट्रियां कचड़ा नहीं उड़ेल रहीं थीं, पर्वत, जो अंधाधुंध खोदे नहीं जा रहे थे और वन, जो काफी काट-छाँट के बाद भी चहुंदिश हरियाली बिखेर रहे थे. एक ओवरब्रिज पार करते समय देवर्षि ने अन्य पर्वतों के बीच खड़े भूरे रंग के माउंट रेनियर को दिखाते हुए बताया कि यह एक ज्वालामुखी पर्वत है. इसके निकट स्थित ज्वालामुखी पर्वत सेन्ट हेलेन 33 वर्ष पूर्व गुब्बारे की भांति फूलने लगा था और फिर लावा, आग, पत्थर और धुंआँ उगलता हुआ फट पड़ा था. हिमालय में ऐसे पर्वत नहीं हैं.

सियाटिल में रहते हुए मुझे कुछ दिन के लिये न्यू जर्सी जाना था. अतः रेडमंड में देवर्षि के घर पहुंचकर मिलने-जुलने एवं चाय-पानी करने के पश्चात मै इंटरनेट पर वायुयान से सिआटिल से नेवर्क (न्यू जर्सी) जाने-आने का किराया देखने लगा. सबसे सस्ता किराया 340 डालर मिला, परंतु वायुयान फिलडेलफिया में बदलना था और वह भी वहां से चलकर नेवर्क एयरपोर्ट के बजाय दूर स्थित वेस्टचेस्टर एयरपोर्ट पर उतरता था. मैंने सोचा कि जब न्यूजर्सी से दूर ही उतरना है तो क्यों न फिलडेलफिया तक का ही रिटर्न टिकट लेकर किराया एवं समय बचाया जाय. अतः मैंने सिआटिल से फिलडेलफिया जाने-आने का किराया देखा, तब मुझे पता लगा कि अमेरिका में वायुयान का किराया अपने हिंदुस्तान की तरह दूरी के अनुपात से नहीं निकाला जाता है क्योंकि सिआटिल से फिलडेलफ़िया की कम दूरी का किराया 390 डालर मिला - यानी कि “टका सेर भाजी, पैसा सेर खाजा”. देवर्षि से इस विसंगति पर बात करने पर उसने बताया कि यहां कभी कभी तो वन-वे टिकट रिटर्न टिकट से मँहगा मिलता है.

सायंकाल देवर्षि ने उसके घर के पास स्थित लेक समामिश चलने को कहा. मार्ग माइक्रोसौफ्ट कम्पनी के मुख्यालय के किनारे-किनारे था- सड़क के दोनो ओर हरे-भरे पेड़ और रंग-बिरंगे मनमोहक फूल. समामिश झील पहुंच कर उसकी विशालता एवँ सुंदरता देखकर मन और मोहित हो गया. तभी अपने कुत्ते को डोरी में बांधे पार्क मेँ टहलाते हुए एक श्वेत महिला दिखाई दी. मेरे देखते-देखते उस बदमाश कुत्ते ने सुंदर से पुष्पित पार्क में मलत्याग कर दिया. वह भद्र महिला उसकी विष्ठा अपने हाथ में लिये टिशू पेपर में उठाकर दूसरे हाथ में लटकाये पोलिथीन बैग में रखकर ऐसे चल दी जैसे पुष्प तोड़कर उन्हेें पोलिथीन बैग में मुलायमियत से रखकर ले जा रही हो.

मुझे तब आभास हुआ कि अपने हिंदुस्तान में अवश्य कुछ ‘खास’ है- अपने यहां पालतू जानवर की विष्ठा न तो कोई खुद उठाता है और न तो दूसरों से उठवाता है, बस उसे ‘पब्लिक प्रौपर्टी’ बनाकर छोड़ देता है.


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