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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी के बारे में...........


रेनबो न्यूज़


भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी के नाम से लेखन करने व पत्रकारिता जगत में चार दशक से ऊपर की अवधि तक सक्रिय भूपेन्द्र वीर सिंह का जन्म 26 जून 1952 को उत्तर प्रदेश के अम्बेडकरनगर जनपद में हुआ था। एक क्षत्रिय परिवार में स्व. कन्हैया सिंह के प्रथम पौत्र और स्व. विभूति सिंह व श्रीमती उर्मिला सिंह के प्रथम पुत्र के रूप में जन्मे गर्गवंशी की शिक्षा दीक्षा गाँव से लेकर विश्व विद्यालयी स्तर तक हुई। उन्होंने अपने किशोरावस्था से ही लेखन में रूचि रहने के कारण कहानी व उपन्यास आदि का लेखन शुरू किया। 70 के दशक के शुरूआती वर्षों से पत्रकारिता की तरफ रूझान रखने वाले गर्गवंशी ने अपने समय के उच्च स्तरीय मीडिया घरानों के ब्राण्डेड प्रिण्ट्स में बहैसियत संवाददाता काम किया। यह क्रम तब समाप्त हुआ जब आज से 10 वर्ष पूर्व 2008 में उनकी रूझान वेब मीडिया की तरफ हुई। पहले दो वर्षों तक भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी ने दूसरे वेब पोर्ट्स में लेखन कार्य किया तत्पश्चात वर्ष 2010 से सुश्री रीता विश्वकर्मा द्वारा सम्पादित/संचालित रेनबोन्यूज नामक वेब पोर्टल में सक्रिय रूप से लेखन व प्रबन्धन कार्य प्रारम्भ किया जो अभी भी जारी है। 66 गर्गवंशी लेखन क्षेत्र में किसी भी युवा से कमतर नहीं हैं। इनके लेखन को प्रोत्साहित करने वाली इनकी जननी 86 वर्षीया श्रीमती उर्मिला सिंह हैं और गर्गवंशी इसे अपना परम सौभाग्य मानते हैं। ----------------------------------------------------------------------------------

बारात के नगर भ्रमण ने इवनिंग वाक का मजा किया किरकिरा

डॉ.भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी हमारे शहर की मुख्य सड़क पर आतिशबाजी, पटाखों और डी.जे. का कानफोड़ू शोर ध्वनि व वायु प्रदूषण की पराकाष्ठा की स्थिति। मैं एक किनारे खड़ा कान पर हाथ रखे देख रहा था सड़क का मंजर। मेरी जगह कोई दूसरा होता तो उसके मुँह से तारीफ ही निकलती, लेकिन मैं कानफोड़ू आवाज से खिन्न खाए खड़ा था चुप्पी मारे। जल्द नाचने, गाने वालों का हुजूम सामने से गुजरे, यही प्रतीक्षा कर रहा था। तभी एक बकचोच ने मुझे टोका बोला डाक्टर साहेब आप सड़क का मंजर बड़ी तन्मयता से देख रहे हैं, मैं तो घण्टे भर से देख रहा हूँ। क्या गजब की आतिशबाजी है, सड़क पर लड़के-लड़कियाँ डान्स कर रहे हैं, मजा आ रहा है। इसी दौरान एक बगलोल और आ गया बोला धन्नासेठ के लड़के की शादी है यह तो होना ही था। अभी देखिएगा वी.आई.पी.गण जब इधर से गुजरेंगे तब कितना मजा आएगा। तीसरा भी उसी ब्राण्ड का आ धमका। बोला पुलिस लगी है, मंत्री लोग आने वाले हैं ये लोग यातायात व्यवस्था में लगे हैं। वाह क्या नजारा है। मेरे साथ 10 वर्षीय साहेबजादे भी कान और नाक बन्द किए खड़े थे उन्हें भी ध्वनि प्रदूषण से चिढ़ है। वह बोले पापा क्या इस पर रोक नहीं है? पुलिस वाले तो टैªफिक संभालने में बिजी हैं, प्रशासन चुप्पी मारे है। डी.जे. पर रोक क्यों नहीं लगाते ये लोग...? मैंने कहा बेटा चलो घर चलकर बताऊँगा। अभी तो बुरे फँसा हूँ। इवनिंग वाक का मजा किरकिरा हो गया है। हम पिता-पुत्र की बातों के दौरान कुछेक और ब्राण्डेड इडियट्स आ गए। वह लोग उचक-उचक कर डाँस कर रहे बारातियों को देखकर आनन्दित हो रहे थे। साहेबजादे मेरे कान में फुसफुसाकर बोले पापा यहाँ से चलिए निकल चलें- रास्ता बदलकर। मैंने कहा बेटा थोड़ा सब्र और कर लो जैसे ही हमारे सामने से डाँस करते बारातियों की टोली/डी.जे. गुजरेगा तुरन्त घर को वापस हो लेंगे। मेरी बात सुनकर वह खामोश हो गए। हमने देखा कि उस बारात पार्टी में आतिशबाजी के साथ-साथ हर्ष फायरिंग हो रही थी। बन्दूक, राइफल और तमंचों से फायर करने वालों की संख्या कुछ अधिक ही थी। नगर भ्रमण के पूर्व बारातियों की सुख-सुविधा आवागमन में आने वाली दिक्कतों को ध्यान में रखकर पुलिस के अधिकारीगण पहले ही पेट्रोलिंग करके मुश्तैद पुलिस कर्मियों को हिदायतें दे चुकें थे। कुल मिलाकर धन्नासेठ जी की बारात का पुलिस वालों ने बड़ा ख्याल रखा था। कई दारोगा अपने हमराह आरक्षियों के साथ सड़क पर आने जाने वाले आम लोगों को रोक-रोक कर बारात के गुजर जाने की प्रतीक्षा करवा रहे थे। जिज्ञासु साहबजादे मुझसे बोले पापा क्या पुलिस का अब यही काम रह गया है? मैंने कहा वत्स पुलिस के कार्य की परिभाषा तो मैं नहीं बता पाऊँगा, लेकिन वर्तमान लोकतंत्र में यह स्थिति हास्यास्पद अवश्य है। वह बोले पापा अपने यहाँ की पुलिस बिकाऊ हो गई है, इसे आम जन की सुरक्षा की चिन्ता नहीं है, बस स्वयं की कमाई के प्रति यह ज्यादा ध्यान देती है। मैं मन ही मन खुश होता हूँ कि कम से कम इस उम्र में साहबजादे में सोचने की क्षमता तो है। अन्ततः हम दोनों जिस जगह खड़े थे, वहाँ से बारात गुजर गई, तब हम बगैर इवनिंग वाक के ही वापस हो लिए। और फिर मैं घर पहुँचकर सोचने लगता हूँ। धन्नासेठ जी और उनके स्वजातीय मंत्रीजनों, वी.आई.पी. बाराती और पैसे का खेल तमाशा आदि मेरी जेहन में बार-बार आने लगा। वर्तमान लोकतंत्र में धन्नासेठ, नेतागण और पुलिस प्रशासन की स्थिति आदि के बारे में सोचता हुआ कब सो गया पता ही नहीं चला। बिजली नहीं थी, ठण्डक कुछ ज्यादा ही थी, रजाई ओढ़े लेटा सोच रहा था और उसी बीच नींद आ गई थी। -------------------------------------------------------------------------------------

हज्जाम और अर्थशास्त्री के वार-पलटवार- डॉ.भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी शाम को शहर की सड़क पर ‘इवनिंग वाक’ के लिए निकला था, तभी एक हज्जाम (नाई/बारबर) का सैलून खुला दिखा। बड़ी लकदक दुकान और दूधिया प्रकाश से रौनक महंगी कुर्सियाँ और आगे-पीछे शीशे लगे हुए थे। युवा हज्जाम से सड़क की ऊबड़-खाबड़ पटरी पर खड़ा ही लगभग चिल्लाकर जोर की आवाज में पूँछता हूँ क्यों बेटा अभी तक दुकान खोल रखे हो? वह बोला हाँ मास्साब ग्राहक थे इसलिए दुकान देर तक खुली रखना पड़ा। उसने अपने दुकान का फर्नीचर, शीशे, कुर्सी, बेंच, सोफे आदि पोंछते हुए मुझसे कहा, आइए मास्साब बहुत दिन हो गया आप मिले नहीं।

मैं भी उस लड़के के बुलावे पर उसके सैलून के अन्दर पहुँच गया और चेहरा शीशे में देखता हुआ स्वयं के हाथ को दोनों गाल पर फेरा तो कुछ खुरदरापन महसूस हुआ, मैंने सोचा दाढ़ी बनाते समय कुछ बाल छूट गए होंगे। मैने नाई से कहा बेटा जरा देखो तो कुछ बाल रह गए हैं, इसे अपने अस्तुरे से निकाल दो। वह तुरन्त अपना छुरा जिसमें पुराना ब्लेड लगा था लेकर मेरी ताजी बनी दाढ़ी को देखने लगा। बोला मास्साब दस रूप्ए बचाने के चक्कर में अपना चेहरा कई जगह काट लिए हैं। वह जानता है कि दाढ़ी मैं अपने हाथों से ही बनाता हूँ।मैंने कहा नहीं डियर पैसा बचाने की वजह से नहीं बल्कि कारण यह है कि दाढ़ी बनवाने के लिए तुम्हारे सैलून पर आऊँ तो इन्तजार करना पड़ेगा, और समय की कीमत तुम बेहतर समझ सकते हो। वह बोला हाँ मास्साब मेरी दुकान पर आएँगे तब मैं अन्य ग्राहकों से इतर आप का नम्बर पहले लगा दूँगा। मैंने कहा डियर इसके लिए थैंक्स, थोड़ा देख लो कि दाढ़ी बाल तो नहीं रह गए हैं। उसने उसी पुराना ब्लेड लगा अस्तुरा मेरे गाल के दोनों तरफ चला दिया और कहा काफी बाल छूट गए थे। मैंने कहा यार दाढ़ी बनाते समय बिजली गुल हो गई थी, तब ढिबरी की रोशनी में अधूरी दाढ़ी बनानी पड़ी थी। हज्जाम लड़के ने कहा बिजली की समस्या कभी नहीं सुधरेगी।

मैंने उससे बहस करना नहीं चाहा था। उस लड़के से बहस करके क्या मिलता। वह अल्पज्ञ और मैं अर्थशास्त्र में डाक्टरेट। कितना अन्तर हम दोनों की सोच में होगा, इसका अन्दाजा मुझ जैसा व्यक्ति सहज ही लगा सकता है। वैसे उसने तो मुझे पहले ही अपने व्यंग्य बाण से आहत कर दिया था कि मैंने दस रूपया बचाने के चक्कर में गाल पर ब्लेड कटिंग्स कर डाला था। उसने यह बात तो सहज कहा था क्योंकि यदि हर कोई स्वयं के हाथों दाढ़ी बाल बनाने लगे तो हज्जाम का अर्थशास्त्र गड़बड़ा जाएगा, लेकिन वह भूल गया कि मुझे अर्थशास्त्र में पी.एच.डी. की उपाधि/सनद बेवजह नहीं मिली थी। हाँ यह बात दीगर है कि वर्तमान महँगाई के युग में मेरी वित्तीय स्थिति कुछ ठीक नहीं है, इसलिए न चाहते हुए भी धनाभाव में कई काम ऐसे करने पड़ते हैं, जिसमेसं मेरी कमजोर नजर साथ नहीं देती है। मसलन दाढ़ी बनाने को ही ले लीजिए। चेहरा साफ-सुथरा रहे, लोगों को अच्छा सुन्दर दिखूँ तो इस पर उगने वाली झाड़-झंखाड़ को नियमित रूप् से साफ करना ही पड़ेगा। यह बाद अलहदा है कि किसी को दृष्टि दोष होने के कारण वह अपनी शेविंग खुद कर पाने में दिक्कत महसूस करे जैसा कि मैं। बहरहाल! युवा हज्जाम ने मेरी दाढ़ी में से शेष रह गए बालों की सफाई कर दिया था। फिर मैंने उसे शुक्रिया कहा और चल पड़ा घर की तरफ। घर की वापसी में मैं सोच रहा था अपने और हज्जाम में अन्तर के बारे में। क्या मुझ जैसे पी.एच.डी. धारक से बड़ा है उस अपढ़ हज्जाम का अर्थशास्त्र। वह तो हज्जाम है उसकी दुकान पर तरह-तरह के लोग दाढ़ी-बाल और चेहरे का मेकअप कराने आते हैं, और वह उनसे अपनी चापलूसी एवं ठकुरसोहाती भरी बातों से मनचाहा पैसा ऐंठता है। इस तरह की लकदक दुकानों पर भारी वजन के बटुआ वाले ही जाते हैं, मुझ जैसे लोग बड़ी हिम्मत करके ही हज्जाम के अर्थशास्त्र के आगे नतमस्तक हो सकते हैं। मेरी अपनी सोच है कि हज्जाम की चापलूसी और ठकुरसोहाती भरी बातों से किसी की माली हालत सुदृढ़ नहीं हो सकती उल्टे पाकेट ही ढीली होगी और उनका अर्थशास्त्र गड़बड़ा जाएगा। चूँकि एक अर्थशास्त्री होने का चार दशकीय अनुभव प्राप्त है, इसलिए मैं समझता हूँ कि वह हज्जाम मुझे उकसाने में कामयाब नहीं रहा, उल्टे मैं ही अपने मकसद में सफल रहा। हाँ यह बात दूसरी है कि उस हज्जाम ने पुराने ब्लेड वाले अस्तुरे से मेरी दाढ़ी के छूटे बालों को साफ किया था। मैं खुश हूँ कि अर्थशास्त्र में पी.एच.डी. की सनद/उपाधि हासिल करके मैं अर्थ को व्यर्थ में नहीं खर्च करता हूँ। किसी की ठकुर सोहाती का असर भी नहीं पड़ता है मुझ पर वह चाहे हज्जाम हो या फिर कोई अन्य पेशेवर चापलूस। खैर! मेरा दस रूपया बचा था, मैं इसी को लेकर खुश था। हज्जाम को मैंने आश्वस्त किया था कि घर के सभी किड्स (बच्चे) तुम्हारी दुकान पर आकर बाल बनवाएँगे। वह भी खुश था कि मास्साब उसके परमानेन्ट ग्राहक बन गए हैं, और मैं इस बात पर प्रसन्न था कि एक पी.एच.डी. उपाधि धारक ने हज्जाम को उसी के वार से पलटवार करके फ्री में दाढ़ी के बालों को साफ कराकर चेहरा साफ-सुथरा करा लिया। -डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी


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