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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



योग


डॉ दिग्विजय कुमार शर्मा 'द्रोण'


 
इस ज़मीं पर एक नैमत मिल गई,
जिंदगी जीने की  सुन्नत मिल गई।

योग  की न्यारी नसीहत मिल गई,
मिल्कियत योगा बदोलत मिल गई।

योग भारत का सनातन धर्म है,
कीमती हमको वसीयत मिल गई।

योग धरती पर अजूबा है बड़ा,
यह समझ लीजै की कुदरत मिल गई।

है ख़ुशी का ये सबब सबके लिए, 
कुछ अलग हट कर के दौलत मिल गई।

मैं रहा तन्हा नहीं संसार में, 
योग की मुझको तो सोहबत मिल गई।

भूलकर के रोग दुनियाँ भोग लो,
योग से जानो तो जन्नत मिल गई।

है नियामत योग नियमित ही करो,
इस जहाँ को एक नई सेहत मिल गई।

यह दिवस जो योग का मुकरर हुआ,
चार दिन जीने की मोहलत मिल गई।

योग से मत पूछिए की क्या मिला, 
सब तरह की यार राहत मिल गई।

एक वर्ज़िश से मुकम्मल आदमी,
योग से सूरत ओ सीरत मिल गई।

योग मसला ही नहीं है मज़हबी,
जात आदम को ये सुन्नत मिल गई।

आदतें 'द्रोण' की थी सब बिगड़ी हुई,
योग से अच्छी नसीहत मिल गई।

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