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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



भूख की पराकाष्ठा


डाक्टर सीमा सोनी


रोज की तरह आज पुनः सैर पर जाते समय मन उन नन्हे मुन्ने प्यारे से पिल्लों को देखने मचल उठा । थे तो वे सड़क छाप अवारा कुत्तों के पिल्ले।लेकिन बच्चे चाहे इंसान के हों या जानवर के उनकी नैसर्गिक ताजगी व नटखट हरकतें वाकई मन मोह लेती हैं । अपनी स्वेटर का जेब टटोलते पार्क के पास पंहुची मैनें उनके लिये बिस्किट जो रख लिये थे।लेकिन यह क्या वहा पंहुच कर लगा कि एक पिल्ला नदारद है।सोचा कोई ष्वानों का कद्रदान ले गया होगा।यह सोच कदम आगे बढाये ही थे कि देखा वहीं ष्वान कुनबे के पास की जगह से नयन आवाज दे रही थी । बोली भाभी गुड मार्निंग । सुबह सुबह आज इधर को।

मैने कहा गुड मार्निंग नयन।हां ] सांय को इस ओर मैं रोज ही टहलने आती हूं ] पर सुबह कभी कभार। मैने कहा अच्छा है कि तुम जल्दी उठने लगी हो ।

तभी वह रूवांसी होते हुये बोली कि एक पिल्ला रात को किसी दोपहिया वाहन के नीचे आ गया ।सभी रात भर उसके पास बैठे रहे।हमें बहुत दुख हो रहा था लेकिन सुबह देखा तो वह दुर्घटना में मरा हुआ पिल्ला गायब था।वह आंखे फाड़ते हुये आष्चर्य से बोली ] भाभी पता लगा है कि इन सबने मिलके उसे खा डाला।सुबह सुबह जोरों की भूख लगी होगी इन्हे । वह यह सब एक सांस मे ही बोल गयी ।

यह अजीब वाक्या सुन मैने आश्चर्य से कहा हें ! और मेरे आगे बढ़ते कदम एकदम से ठिठक गये । जो कुतिया पिल्लों की देखभाल इतने जतन से करती थी । जी जान से दिन भर लगी रहती थी । किसी को अपने जिगर के टुकडो़ं के पास नही फटकने देती थी A वही भूख के आगे इतनी बेबस हो गयी कि उन सबने अपने जिगर के टुकडे़ को ही अपना गा्रस बना लिया।मेरी आंखो से अनायास आंसू निकल आये। सबसे भोला व प्यारा वही भूरी आंखो वाला पिल्ला था।मै चिंतित सोच के साथ आगे बढी़ कि इन पालत जानवरों के एैसे विचित्र व्यवहार परिवर्तन के लिये कंही न कंही हम इंसान ही दोषी हैं।जो आज के समय में ष्ष्वानों के लिये रोटी बनाना व उन्हे खिलाना भूल ही गये हैं।पहले जो भी बासी खाना थोडा़ बहुत बचता था अब वह’अबकि भोपाल की नम्बर एक की बारी है’ कार्यक्रम की भेंट चढ़ उदर मे नही उधर को कचरा गाडी़ में चला जाता है ।

काश कि हम सब आज भी अपने बुजुर्गो के बनाये नियमों का पालन करते होते जंहा कि हर घर मे गाय व कुत्तों के लिये भी अलग से रोटी बना रखी जाती ] तो ये कुत्तें भूखे न रहते न कचरे में अपना खाना ढूंढ़ते होते और न ही अपने ही बेटे भाई को खाकर अपनी पेट की क्षुधा मिटाने जैसा असामान्य व्यवहार करते होते ।

आधुनिक जिंदगी की आपाधापी में यदि हम बुजुर्गो की सीख व पुरानी परंपराओं का पालन करते होते तो इसंान का सदियों का यह वफादार पा्रणी आज एैसा मजबूर न होता । मुझे अपने बचपन की एक बात याद आ गयी । एक बुजुर्ग महिला को सब्जी बेचते देख मैने यों ही बाल सुलभ जिज्ञासा में पूछ लिया था कि अम्मा तुम इतनी उम्र मे यह काम क्यों करती हो तो उसका जबाब था कि बेटा ये पेट बडा़ पापी है यह सब करवाता है ।

उस समय तो मेरे बाल मन को यह समझ नही आया था लेकिन अब मुझे समझ मे आया कि उक्त घटना भी पापी पेट की भूख की पराकाष्ठा है ।


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