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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



पाषाण


नज़्म सुभाष


गर्भगृह के द्वार से छनकर आती सूर्य किरण भी शून्य में सिमटते- सिमटते अंततः विलीन हो गयी।उसने गौर से सुना शायद किसी ने अभी-अभी दरवाजे पर सांकल लगा दी है ।अब सू्र्य किरणें निरुपाय थीं। अन्यथा अभी तो दोपहर है।उसका दिल धक् से रह गया। क्या किसी अनहोनी की आहट है?

वह आज प्रथम बार देवता से मिलने आई थी। एक ऐसे देवता से जिससे उसे प्रतिपल नई ऊर्जा मिलती रही है किंतु पहले ही साक्षात्कार में इतनी गहन कालिमा...... सीढ़ियों से आती हर खट् खट् की आवाज उसे अपने हृदय पर पड़ती महसूस हो रही थी। अंधेरे में भी उसने महसूस किया पाषाण प्रतिमा पूर्वत वहीं विराजमान है ।आवाज अब एकदम करीब थी।क्या आज वो भी पाषाण बन जाएगी? नहींssssss... मगर उपाय.... प्रभु चरण रज.....वो प्रभु चरण छूने के लिए आगे बढ़ी ....वो झुकती ...उससे पहले ही किसी ने जोर से उसे अपनी ओर खींच लिया ....संभलने का मौका ही नहीं था ।लड़खड़ाते हुए वो कीमती फर्श पर ढेर हो गई। सामने साधु वेश में इंद्र ....कामुकता से लार टपकाता हुआ....।

" प्रभु ....रक्षा करो प्रभु!"

उसने कातरदृष्टि से मूर्ति की ओर देखा।

मूर्ति ने सुना मगर विवशता से उसकी आंखों में आंसू उभर आये।

इस वक्त वो अस्त-व्यस्त-सी बैठी मूर्ति को देख रही थी। इंद्र अहिल्या की देह को पाषाण में तब्दील करके कब का जा चुका था।भावनाशून्य -सी वो बस इतना भर कह पायी-"अच्छा ही किया भगवन्......आपकी शरण में थी अपने जैसा ही बना दिया"

आंसुओं की जगह आंखों में आग उतर आयी थी।


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