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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



हरामखोर


नज़्म सुभाष


अब तो हर पैडिल के जोर पर शरीर से जैसे चिंगारियां फूट रही थी। पैंतालीस डिग्री तापमान की दहकती धूप..... सड़क आग उगल रही थी। सवारी उसने बैठा तो ली मगर अब पछता रहा था ।लेकिन क्या करता आजकल पूरा दिन तो खाली चला जाता है ।ई-रिक्शा आने से इन रिक्शों को वैसे भी कोई नहीं पूछता बड़ी मुश्किल से सवारी हाथ लगी थी। कैसे जाने देता..

मुंह चटपटाने लगा था ।प्यास तो बहुत देर से लगी है मगर कहीं हैंडपंप दिखे तभी तो प्यास बुझाये। 20 रुपये की बोतल खरीदने की वो सोच भी नहीं सकता ।

"भैया जरा तेज चलो ...ट्रेन छूट न जाये... हम तो पहले से ही लेट थे ....आपको बताया था ।

"हां हां मैडम ...चलता हूं .तेज ही चलता हूं"

जैसे वो नींद से जागा था। उसने इस बार पूरी ताकत पैडल पर झोक दी। महसूस हुआ पसलियों में कुछ धंसक सा गया है ।मगर 30 रुपये का लालच ...उसने दुबारा ताकत लगाई ।कोटरों में धंसी आंखें जैसे बाहर निकल आना चाहती हों।दिमाग सुन्न हो गया ।वो पूरी ताकत लगाकर पैडल मार रहा था। स्टेशन पहुंचना है किसी तरह....स्टेशन आने ही वाला था।उसने पुनः जोश भरा...और पैडिल पर उलीच दिया।उसकी आंखों में अंधेरा उतर आया...कुछ भी नही दिख रहा था...बियाबान अंधेरा....। अचानक धड़ाक की आवाज के साथ रिक्शा डिवाइडर मे घुस गया।और इसी के साथ वो जमीन पर... घुटने छिल गये...हाथों में बजरी धंस गयी।

" दारू पीकर रिक्शा चलाता है हरामखोर ....अभी मार डालता।" डिसबैलेंस हुई सवारी चिल्लाई।

आसपास के लोग इकट्ठे हो गये।

" मैडम आप निकल जाइए...स्टेशन पास ही है... यह साले हरामखोर होते ही ऐसे हैं ।"

मैडम ने हां में सिर हिला दिया।

वह अभी जमीन पर पड़ा था ।उसकी हरामखोरी उसे उठने नहीं दे रही थी।मैडम ने पर्स संभाला और चलती बनीं......उनकी पर्स का वजन अब भी उतना ही था।


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