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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



अब तुम व्यस्त रहने लगे हो


वर्षा वार्ष्णेय


                                                            
देखती हूँ अब तुम व्यस्त रहने लगे हो ,
धरा से तोड़कर संबंध सारे 
आसमान से बातें करने लगे हो ।

अद्भुत  व्याख्या है तुम्हारे सपनों की
चकित हूँ फिर से भूलकर हक़ीक़त 
कहवा में नीड़ बुनने लगे हो । 

बागवान को सजाते सजाते भूल न जाना तुम अपनी हक़ीक़त , 
क्यों जिंदगी से अपनी मुख मोड़ने लगे हो 

रेशमी जुल्फों के घने साये में महफूज है प्यार की सल्तनत ,
क्यों प्यार को भुलाकर जमाने से उलझने लगे हो ।

मेरा दिल जलाकर तुम भी सुकून कहाँ पाओगे ,
न होंगे जब हम तन्हाई में आँसूं बहाओगे 

भुलाकर दुनियादारी चले भी आओ प्यार की हसीन दुनिया में ,
क्यों दिल को वैराग्य का दामन समझने लगे हो  ।
 

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