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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



नारी आसां होती


तनुजा नंदिता


                                                            
सरल शब्दों में
नारी आसां होती
व्यापक शब्दों में
जीवनदान होती....
दुनियाँ की नज़र में
सहानुभूति अपार होती
दर्द ज़माने में जितने कम
नारी तो बस महान होती.....
सबला बन घर की आन
विश्वास की ये खान होती
पुरुष बिन नारी कौन यहां
सच यही बस नादाँ होती…
कठिन परिश्रम औ मुस्कान
साथ गृह औ विज्ञान होती
दिमाग कम दिल की शान
नारी तो बस वरदान होती…..
ममता के सागर में बह कर
आसूंओ का फिर समंदर होती
अहसासों को सिलकर सीने में
नारी की यही पहचान होती….
समय के साथ बनती कामना
सीता कभी अहिल्या समान होती
जीवन के अग्निपथ पथ पर सदा
नारी वास्तविक अर्थ में अंजान होती.....
कि मैं निकल तुमसे निभायी.....अस्तित्व बेजान होती.....!!
 

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