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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई के बलिदान दिवस पर


सुशील यादव


                                                          


तुम रक्षक हो सीमा-प्रहरी ,पथ में आगे बढे चलो
पहाड़ दुर्गम  को लाघों,दुरूह घाटी चढ़े चलो
मानवता के तूल तुम्ही  ,मिट्टी के हो कारीगर
बिन मन्दिर पूजे जावो ,मूरत वो भी  गढ़े चलो
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एक दिया तम में रखना ,एक जले आधी आगे
हो अडिग विश्वास तुम्हारा ,सर-पैर ले दुश्मन भागे
सीमा से जब वापस आओ ,माँ के लाल बहन-वीरा
हर  सुहागन दृग देखना , कैसे सोये दिन जागे
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शांति जिसने जकड़ लिया, 'पर' अहिंसा के हैं काटे
मक्कारी  चादर ओढ़े ,परचम जिहाद के  बांटे
मजहब के चण्डालों का,मखौल क्यों नहीं  उड़ाये ,
इनकी मकसद के जड़ को,क्यों न अभी कतरें- छांटे
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लक्ष्मी-बाई सा साहस ,अपने भीतर आप भरो
जीवन शब्दकोश निकालो ,कायरता से काश डरो
लोहा लेने की बारी , कतार पीछे  क्या रहना
जन-जन में चिश्वास जगे ,आपतकाल उसे  लड़ना
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मर्दानों की शक्ति लेकर , एक रानी  रण में आई
उम्र की कोमल काया थी ,उतरी न थी  तरुणाई
अंग्रेजो को रण में तब ,कैसे  खूब छकाती थी
वो थी  रानी झाँसी या ,संदेश भरी  पाती थी

		
 

 

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