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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



कंकाल की पुकार


शिबू टुडू


                                                                    
मुझे लौटा दो,
मेरी उस उम्र को,
जिसमें थी सौ-सौ साल तक जीने की तमन्ना।
मुझे लौटा दो
मेरी वो तकदीर,
जिसमें न था अन्न-अभाव।
मुझे लौटा दो
मेरी वो हरियाली
जिसमें थी, रंग-विरंगी तितलियों की किलकरियाँ।
मुझे लौटा दो
मेरे उन बहती झरनों को
जहाँ था हजारों मेंढ़कों का ताल।
मुझे लौटा दो
मेरी उन पगडंडियाँ को
जिसमें थे अनगिनत रेंगने वालों की आर-पार।
मुझे लौटा दो
मेरे उन बदलों को
जिसमें था अनवरत वर्षा करने की दम।
मुझे लौटा दो
मेरे उन चीड़-साल वृक्षों को
जिसमें था गगन को छूने की होंसला।
मुझे लौटा दो
मेरे उन जंगलों को
जहाँ था हजारों-हजार जीवों का बसेरा।
मुझे लौटा दो,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,।

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