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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



विभाजन


लवनीत मिश्रा


गुलामी की जंजीर हटी,
अपनों ने ही घर लूटा,
बंटवारे के नाम पर,
घर बार सब कुछ छूटा,
जहाँ कभी रहते थे मिलकर,
हर धर्म के वासी,
बंटवारे के फंदे ने,
लगाई सुख को फांसी,
दर-दर भटके घर की इज्जत, 
दानव थे घात लगाए,
धर्म के काले फंदो ने,
कितनों के सर कटवाए,
सोच-सोच कर हृदय है दुखता,
ऐसी दुर्बलता छाए,
संकट मे थी बहन बेटियां,
माताएँ नीर बहाए।

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