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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



वीर शिरोमणि ''महाराणा प्रताप'' की 478 वीं जयंती पर
"वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप"


कवि जसवंत लाल खटीक


  
रतना का गुड़ा ,देवगढ़
काव्य गोष्ठी मंच, राजसमन्द
राणा उदयसिंह , के सपूत ,
थी , उनकी राजपूती शान ।
आओ ! मिलकर सब करें  ,
महाराणा प्रताप , का सम्मान ।।
राणा प्रताप , का नाम सुनके ,
दुश्मन , सारे घबराते थे ।
अकबर , तो सपने में डरता ,
शेरों , से वो , दहाड़ते थे ।।
छापली थी , मुगल छावनी ,
दिवेर से , जीत की शुरुआत हुई ।
घोड़े समेत , बहलोल खाँ को चीरा ,
वीर प्रताप की , जय जय कार हुई ।।
कभी प्रताप , नही हारे थे ,
थी , उनकी , अजेय तलवार ।
रणभूमि , में शेर बन जाते ,
खाली नाजाता कोई वार
रण में , निकले वीर प्रताप ,
नीले घोड़े , पर हो असवार ।
दो सो आठ किलो , वजनी थे ,
भाला , कवच और तलवार ।।
चेतक , हवा से बातें करता ,
प्रताप , चलाये भाला , तलवार ।
दुश्मनों को , चीरते जा रहे ,
दोनों हाथों , से करके वार ।।
चेतक ने किये , प्रबल वार ,
हाथी पर रख दिए , अपने टाप ।
महावत मरा , मानसिंह बचा ,
वीरों के वीर थे , महाराणा प्रताप ।।
अपने स्वामी , को बचाने ,
कूद गया चेतक , नाले के पार ।
स्वाभिभक्त था , नीला घोडा ,
नाले किनारे , त्यागा संसार ।।
हल्दीघाटी , खून से लतपथ ,
अकबर , को धूल चटायी थी ।।
वन में , दर-दर भटके थे ,
घास की रोटी , खायी थी ।
मेवाड़ के , वीर शिरोमणि ,
सब प्रताप को , आदर्श मानते हैं ।
देशभक्ति की , मिसाल प्रताप ,
भारत के बच्चे-बुड्ढे जानते हैं ।।
"जसवंत" लिखे , प्रताप की गाथा ,
सब मिलकर , गाये गुणगान ।
आओ ! मिलकर , और बढ़ाये ,
महाराणा प्रताप , का मान ।।

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