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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



कुरूपता - मन का वहम


कवि जसवंत लाल खटीक


 
रूप ,कुरूप ,
सब मन का वहम ।
इश्क हो , अगर सच्चा ,
तब हो जाते , रिश्ते अहम ।।
रूप अच्छा होने से ,
सब कुछ , हासिल नहीं होता ।
रूप सलौना है , तोते का ,
फिर भी ,
कोयल सा गान , उससे नहीं होता ।।
कितने भी हो , कुरूप बच्चे ,
माँ-बाप के लिए , खूबसूरत होते है ।
रूपवान भले ना हो , माँ-बाप ,
फिर भी, बच्चों के लिए ,
भगवान की मूरत होते है ।।
रूप भले हो , अप्सरा जैसा ,
संस्कार विहीन हो फिर ,
जीवन कैसा ।
संस्कारित हो , भले कुरूप पत्नी ,
घर बन जाता , जन्नत जैसा ।।
आज की आधुनिकता , में भी ,
ऐसी बेहूदी सोच ,
तुम रखोगे ।
सबको समानता का , हक दो ,
फिर ही जीवन का असली रस ,
तुम चखोगे ।।
भगवान सबको ,
एक जैसा बनाता है ,
फिर भी ,
मानव भेदभाव कर जाता है ।
अरे ! रूप और कुरूप तो ,
सब है , कुदरत की माया ,
ये तो , अपनी सोच दर्शाता है ।।

"जसवंत" कहे सुधारों सोच ,
क्यों , ऐसी हरकत कर जाते हो ।
अरे ! कुरूपता तो ,
तुम्हारी सोच में है ,
तुम क्यों , समाज में 
अंधकार फैलाते हो ।।

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