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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



प्रायश्चित


डॉ० अनिल चड्डा


 
ऐ पूज्य पिता
हर बरस
तुम्हारी बरसी पर 
तुम्हे याद करना 
मेरा एक नियम सा 
बन गया है 
शायद इस तरह 
तुम्हारे एहसानात का 
कुछ तो 
बदला चुका पाऊँ
तुम्हारे रहते तो
मैंने तुम्हारी महत्ता को 
नकार सा दिया था 
अपनी महत्वकांक्षा
अपने स्वार्थ को 
सर्वोच्च मान लिया था 
भूल गया था 
संसार के 
ऊँचे-नीचे, ऊबड़-खाबड़ 
रास्तों पर चलना 
तुम्ही ने तो सिखाया था 
जीवन की वैतरणी में 
तैरना भी 
तुम्ही ने सिखाया था 
तुमने मुझमें 
अपनी अपूर्णता 
अपनी महत्वकांक्षा का 
प्रतिबिम्ब देखने की 
कामना की थी 
पर मैं 
तुम्हारी महत्वकांक्षा पर 
खरा नहीं उतर पाया 
तुम्हारा प्रतिबिम्ब 
बनने के बजाय
मैंने अपनी महत्वकांक्षा को 
प्राथमिकता देना ही 
उचित माना 
अपनी भूल का 
एहसास मुझे तब हुआ 
जब मैंने 
तुम्हारे निर्जीव शरीर को 
अग्नि के समर्पित कर दिया 
तुम्हारे कष्ट तो 
अग्नि ने लील लिए
पर मैं 
तुम्हारी चिता की अग्नि से 
सदैव जलता ही रहूँगा 
और प्रायश्चित के लिये 
हर बरस
मन ही मन 
तुम्हे नमन कर 
एक बार फिर 
क्षमा याचना कर लूँगा

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