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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



सुहागन सती सावित्री


तेजपाल सिंह धामा


चंपारण जिले के नरकटियागंज की कहानी है यह। यहीं विवाह होकर आई थी सावित्री। सावित्री जन्म से मुस्लिम थी, कुछ ही दिन पहले उनका परिवार मुस्लिम से हिन्दू बना था। उनके पति का नाम था वैद्यनाथ और श्वसुर का नाम धरिच्छनराम था। शादी के समय वैद्यनाथ की उम्र केवल 19 साल ही थी और सावित्राी तो 15 साल की थी। सावित्राी अभी कच्ची कली ही थी, यौवन के पुष्प खिले ही कहाँ थे, फिर भी आ गई सुहाग की सेज पर...सुहागरात ही थी उस दिन...दूध का गिलास लेकर सास ने भेज दिया था पति के कमरे में।

‘‘दूध पी लीजिए!’’ उसने घूँघट की आड से पति को कहा था।

‘‘नहीं रहने दो स्टूल पर रख दो और मेरे पास आओ...।’’

‘‘ना बाबा ना मैं आपके पास नहीं आऊँगी?’’

‘‘क्यों हमारे पास क्यों नहीं आओगी, अरे हम तुम्हें विवाह कर लेकर आए हैं, भगाकर नहीं लाए, तुम तो हमारे बच्चों की माँ बनोगी।’’ कहते हुए वह उसको छूने चला था।

‘‘मुझे नहीं बनना गुलाम देश में हिन्दुओं के मुस्लिम बच्चों की माँ।’’ दूर हट गई थी वह। उसे बस इतना ही पता था कि यदि मर्द औरत को होंठों से छू लेता है तो वह पेट से रह जाती है, आगे दीन दुनिया जानती ही न थी।

‘‘गुलाम देश में हिन्दुओं के मुस्लिम बच्चों की माँ? यह तुम क्या कह रही हो सावित्री।’’

‘‘मैं सही कह रही हूं मैंने बस्तीराम अग्निवाण के भजन सुने हैं, उन्होंने ही कहा था कि हैदराबाद निजाम सबको मुस्लिम बना रहा है, वह कहता है मुगलों की विजय पताकाएँ फिर से कश्मीर से कन्याकुमारी तक लहराएँगी...सब हिन्दुओं को मुसलमान बना देगा। ना बाबा ना, थूक कर चाटना मुझे पसंद नहीं...मैं दोबारा मुस्लिम बनकर मांस नहीं खाऊँगी, न ही मांसाहारी बच्चे पैदा करूँगी। उसने पवित्र वेदों पर भी प्रतिबंध लगा दिया है। मुझे तो वेदमंत्रा प्रिय हैं अजान नहीं।’’

‘‘तो फिर क्या करोगी तुम?’’

‘‘मैं तो औरत हूँ ना...मैं क्या कर सकती हूँ, करना तो तुम्हें है।’’

‘‘मुझे क्या करना है?’’

‘‘जाओ निजाम का सिर काटकर ला दो, ताकि हमारे वेद बचे रह सकंे और मेरी होने वाली संतान वेद मंत्रा पढ़ सकें।’’

‘‘इतना आसान है क्या यह?’’

‘‘तो जाओ अपना सिर कटवा लो, एक कायर की अपेक्षा एक शहीद की विधवा होकर मरने में मुझे गर्व होगा।’’

19 वर्ष का वह युवा वैद्यनाथ उसी समय निकल पड़ा था हैदराबाद के लिए...उसने मालूम किया कि उस दिन निजाम किंग कोठी में ऐश करेंगे, तो वह किसी तरह छिपता छिपाता किंग कोठी में पहुँच गया था। यहाँ तक कि निजाम के कमरे ही नहीं उसके पलंग के नीचे तलवार लेकर छिप गया था। निजाम आया कमरे में लेकिन वह बहुत सनकी था, अपने साथ दो तीन औरतें लेकर आया और उन्हें कमरे की तलाशी लेने को कहा। अब तलाशी में वैद्यनाथ पकड़ा गया। अरेस्ट करके उसे पालमूर के जंगलों में बनाई गई जेल में ले जाया गया था। वहाँ उसे तरह-तरह की यातनाएँ दी गई, इस्लाम कबूलने के लिए प्रलोभन दिया गया, लेकिन वह टस से मस न हुआ अपने धर्म पर अडिग रहा।

‘‘तुम्हें इस्लाम कबूलने में आपत्ति क्या है?’’ जेलर ने पूछा था।

‘‘मुझे कोई आपत्ति नहीं, लेकिन मेरी पत्नी को है, वह चाहती है कि मैं निजाम का सिर काटकर ले जाऊँ।’’

‘‘छोड़ दो उस पत्नी को इस्लाम कबूल लो, यहाँ हूर की परी से तुम्हारा निकाह करवा दिया जाएगा, मैं खुद अपनी साली से तुम्हारा निकाह करवा दूँगा और घर, जमीन जायदाद सब मिलेंगी।’’

‘‘तुम खुद ही बताओ, मैं अबोध नारी का साथ कैसे छोड़ दूँ, जिसने देश और धर्म के लिए अपने मांग के सिंदूर को धर्म की बलिवेदी पर चढ़ा दिया हो।’’ वैद्यनाथ ने कहा था।

फिर उसको इतनी घोर पीड़ा दी गई कि वह मरणासन्न की स्थिति में पहुँच गया और एक दिन मरा समझकर उसे जेल से बाहर जंगल में फेंक दिया गया, वहाँ कुछ हिन्दुओं ने उसे देखा, वह तो जिंदा था। उसे लाकर बेतिया अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ 25 जून 1939 को उनका देहावसान हो गया। लाश घर लाई गई, सबका रो-रोकर बुरा हाल था, लेकिन सावित्री की आँखों से एक भी आँसू न निकला। औरतें कानाफूंसी करने लगी थी, कैसी रांड है पति के मरने का भी गम नहीं, चूड़ियाँ टूट चुकी थी। फिर उसने खुद ही अपने सारे जेवर उतारकर एवं जो घर के अंदर रखे थे वे भी लाकर सब मर्दो के सामने आकर अपने ससुर से कहा, ‘‘पिताजी, उनके जाने का तुम्हें बहुत दुख है, लेकिन मैं प्रसन्न हूँ कि मैंने अपना पति देश और धर्म पर लुटा दिया, क्या मेरी अंतिम इच्छा पूरी करोगे?’’

‘‘कहो बेटी?’’

‘‘इन गहनों को बेचकर एक धर्मशाला और यज्ञशाला यहाँ गाँव में बनवा देना, वह पूरी तरह जेवर अपने ससुर को दे भी न पाई कि ससुर के पैर पकड़ते हुए जमीन पर गिर दंडवत हो गई...कुछ औरतों ने उसे उठाया, लेकिन उसके तो प्राण पखेरू उड़ चुके थे...एक ही चिता में पति और पत्नी दोनों का अंतिम संस्कार किया गया, अग्नि की लपटों और लकड़ियों के बीच उनका शरीर दिखाई न पड़ रहा था, दीपक तले अंधेरे की भाँति उनके लिए यह रात ही थी...रात ही क्यों शायद सुहागरात....कालांतर में वहाँ शहीद वैद्यनाथ की स्मृति में एक धर्मशाला का निर्माण अवश्य हुआ, लेकिन उस पर सावित्री का कहीं नाम न था।


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