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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



हाइकु


अशोक बाबू माहौर


 
1.
शहरी बाबू वकालत हाँकता समझे कौन।
2.
रूठती बच्ची खिलौना पास नहीं माँ समझाती।
3.
तारे अनेक टिमटिमाते खूब उजाला साफ।

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