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वर्ष: 2, अंक 40, जुलाई(प्रथम), 2018



विश्वास से अनुबन्ध


राजेन्द्र वर्मा


                                                        
जब किया विश्वास से अनुबन्ध मैंने,
बन गयी हर शक्ति
मेरी सहचरी है ।
 
जग भले कहता रहे, यह देह क्षर है
किन्तु मेरी दृष्टि औरों से इतर है
स्वार्थ पर प्रतिबन्ध जब मैंने लगाया
काल ने मुझमें नवल
उर्जा भरी है ।
 
प्राण-जागृति को पवन चलने लगा है
टिमटिमाता दीप फिर जलने लगा है
स्निग्धता छायी हुई वातावरण में
खिल उठी अन्तःकरण में
मंजरी है ।
 
रश्मियाँ-ही-रश्मियाँ हैं हर दिशा में
इन्द्रधनु जैसे निकल आया निशा में
चन्द्रिका से कब रखा सम्बन्ध मैंने
किन्तु छलकी जा रही
मधुगागरी है !       

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